शरद कटियार
उत्तर प्रदेश एक बार फिर दुनिया के सामने यह संदेश देने की तैयारी में है कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। प्रदेश सरकार द्वारा मानसून सत्र में 35 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य केवल एक सरकारी अभियान नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, भूजल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन के खिलाफ एक व्यापक जनआंदोलन का स्वरूप लेता दिखाई दे रहा है।
बीते कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश ने पौधरोपण के क्षेत्र में जो रिकॉर्ड स्थापित किए हैं, वे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बने हैं। नौ वर्षों में 242 करोड़ से अधिक पौधरोपण का दावा केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि इसके पीछे प्रदेश के वन क्षेत्र को बढ़ाने, जैव विविधता को संरक्षित करने और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित पर्यावरण तैयार करने की सोच दिखाई देती है।
आज जब देश के अधिकांश हिस्से भीषण गर्मी, सूखे, प्रदूषण और मौसम की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं, तब 1900 से अधिक नर्सरियों में 52.44 करोड़ पौधे तैयार करना दूरदर्शी योजना का परिचायक है। यह अभियान केवल पेड़ लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से पर्यावरणीय सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जैविक खेती और रोजगार के नए अवसरों को भी जोड़ा जा रहा है।
गंगा एक्सप्रेसवे के किनारे 5.50 लाख पौधे लगाने की योजना विशेष महत्व रखती है। आधुनिक आधारभूत संरचना के साथ हरित विकास का यह मॉडल भविष्य के लिए उदाहरण बन सकता है। अक्सर विकास परियोजनाओं पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन यदि एक्सप्रेसवे के साथ बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित होती है तो यह विकास और पर्यावरण संरक्षण के संतुलन का सफल मॉडल सिद्ध होगा।
इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता नए विशिष्ट वनों की स्थापना है। महर्षि चरक औषधि वन, समरस वन, समृद्धि वन, कृषि वन, ऊर्जा वन और कपि वन जैसी अवधारणाएं केवल नाम भर नहीं हैं। इनके माध्यम से सरकार पर्यावरण संरक्षण को सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं से जोड़ने का प्रयास कर रही है। विशेष रूप से औषधीय पौधों पर आधारित वन भविष्य में आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में नई संभावनाएं पैदा कर सकते हैं।
हालांकि किसी भी पौधरोपण अभियान की सफलता केवल पौधे लगाने से नहीं मापी जा सकती। वास्तविक चुनौती इन पौधों को जीवित रखने की होती है। अतीत में कई बार यह प्रश्न उठते रहे हैं कि करोड़ों पौधे लगाए जाने के बाद उनकी उत्तरजीविता दर कितनी रही। इसलिए इस बार प्रशासन और स्थानीय निकायों की जवाबदेही तय करना उतना ही आवश्यक होगा जितना पौधरोपण करना।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा जनसहभागिता पर दिया गया जोर इस अभियान की सफलता की कुंजी बन सकता है। जब तक गांव, नगर, विद्यालय, महाविद्यालय, सामाजिक संगठन, स्वयंसेवी संस्थाएं और आम नागरिक इस अभियान को अपना अभियान नहीं मानेंगे, तब तक स्थायी परिणाम प्राप्त नहीं किए जा सकते। पेड़ केवल सरकारी फाइलों में नहीं, बल्कि समाज की चेतना में रोपे जाने चाहिए।
विश्व पर्यावरण दिवस, रक्षाबंधन, शिक्षक दिवस और स्वतंत्रता दिवस जैसे अवसरों को पौधरोपण से जोड़ना भी सकारात्मक पहल है। इससे पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी कार्यक्रम न रहकर सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बन सकता है।
आज पूरी दुनिया जलवायु संकट से जूझ रही है। बढ़ता तापमान, घटता भूजल स्तर और प्रदूषण मानव अस्तित्व के सामने गंभीर चुनौती बन चुके हैं। ऐसे समय में उत्तर प्रदेश का यह अभियान केवल राज्य की आवश्यकता नहीं, बल्कि वैश्विक पर्यावरणीय जिम्मेदारी की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
जरूरत इस बात की है कि लगाए गए प्रत्येक पौधे को एक जीवित धरोहर माना जाए। यदि पौधरोपण महाभियान जनभागीदारी, पारदर्शिता और निगरानी के साथ आगे बढ़ता है तो आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश केवल आबादी में ही नहीं, बल्कि हरित विकास के मॉडल के रूप में भी देश का नेतृत्व करता दिखाई देगा।यह संपादकीय अखबार के संपादकीय पृष्ठ या “आज का विचार” कॉलम में प्रकाशित करने के लिए उपयुक्त है।


