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Tuesday, May 26, 2026

सीजेआई सूर्यकांत के बयान पर देशभर में बवाल, पूर्व अफसरों-वकीलों ने खोला मोर्चा

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत के एक और बयान को लेकर देशभर में नया विवाद खड़ा हो गया है। देश के पूर्व आईएएस, आईपीएस अधिकारियों, वरिष्ठ वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं समेत 70 से अधिक हस्तियों ने सीजेआई को खुला पत्र लिखकर उनकी मौखिक टिप्पणियों पर गंभीर आपत्ति जताई है। इस घटनाक्रम ने न्यायपालिका की कार्यशैली, अदालतों में जजों की टिप्पणियों और न्यायिक निष्पक्षता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

पूरा विवाद सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान की गई उस टिप्पणी से जुड़ा है, जिसमें सीजेआई सूर्यकांत ने कहा था कि “भारत में एक भी ऐसी परियोजना दिखाइए, जहां पर्यावरण कार्यकर्ता यह कहते हों कि हम इस परियोजना का स्वागत करते हैं और देश प्रगति कर रहा है।” हालांकि यह टिप्पणी किसी लिखित आदेश का हिस्सा नहीं थी, लेकिन अदालत की कार्यवाही के दौरान कही गई इस बात के सामने आते ही कानूनी और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया शुरू हो गई।

खुला पत्र लिखने वाले पूर्व अधिकारियों और वकीलों का कहना है कि अदालत में जजों द्वारा की जाने वाली मौखिक टिप्पणियां अक्सर मीडिया की सुर्खियां बन जाती हैं, जबकि वे अंतिम आदेश का हिस्सा नहीं होतीं। इससे आम जनता के बीच यह संदेश जाता है कि अदालत ने पहले ही किसी मुद्दे पर अपनी राय बना ली है। पत्र में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च संस्था से जनता निष्पक्षता और संतुलन की उम्मीद करती है, इसलिए सुनवाई के दौरान भाषा और टिप्पणियों में अत्यधिक संयम जरूरी है।

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब सीजेआई सूर्यकांत पहले से ही अपने कथित “कॉकरोच” बयान को लेकर चर्चा में हैं। बेरोजगार युवाओं को लेकर की गई उस टिप्पणी पर सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी। बाद में सफाई दिए जाने के बावजूद मामला शांत नहीं हुआ और विपक्षी दलों तथा युवाओं के संगठनों ने न्यायपालिका की संवेदनशीलता पर सवाल उठाए थे।

अब नए बयान के सामने आने के बाद विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने एक बार फिर न्यायपालिका और सरकार के बीच बढ़ती नजदीकियों को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। वहीं कानूनी विशेषज्ञों का एक वर्ग यह भी मानता है कि अदालतों में मौखिक टिप्पणियां न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं और उन्हें अंतिम फैसले की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।

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