– असली पत्रकारिता हाशिए पर, फरियादियों की जगह कैमरों का जमावड़ा
– तेरहलखिया बना चर्चा का केंद्र बिंदु
यूथ इंडिया |
फर्रुखाबाद।जिले के कलेक्ट्रेट परिसर में इन दिनों एक नया “अनौपचारिक तंत्र” तेजी से सक्रिय दिखाई दे रहा है। हाथों में कथित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चैनलों की आईडी वाले माइक लेकर घूमने वाले कुछ कथित मीडिया कर्मियों की भीड़ पूरे दिन अधिकारियों के आसपास मंडराती रहती है।इनमें कुछ ऐसे जिन्हे पत्रकारिता से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं, लेकिन प्रशासनिक गलियारों में इनका प्रभाव किसी स्थायी तंत्र की तरह स्थापित हो चुका है।
कलेक्ट्रेट आने वाले फरियादियों का कहना है कि परिसर में शिकायत लेकर आने वाली जनता से ज्यादा सक्रियता इन तथाकथित मीडिया कर्मियों की नजर आती है। फरियादियों के बैठने की कुर्सियों तक पर कब्जा जमाकर यह लोग अधिकारियों के आने-जाने का इंतजार करते हैं और जैसे ही कोई अधिकारी सामने आता है, माइक सीधे चेहरे पर टिकाकर वही दो रटे-रटाए सवाल दाग दिए जाते हैं— “क्या मामला है?” और “क्या हो रहा है?”। इसके आगे न कोई तथ्यात्मक पड़ताल, न जनहित से जुड़ा प्रश्न और न ही प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की गंभीर कोशिश।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि कथित “दलाल मीडिया” का एक हिस्सा प्रशासनिक फैसलों और पुलिस की अंदरूनी गतिविधियों की जानकारी कथित तौर पर अपराधियों और प्रभावशाली माफियाओं तक पहुंचाने का माध्यम बन चुका है। चर्चा यह भी है कि कुछ लोग बड़े अधिकारियों के साथ अपनी तस्वीरें, फोन कॉल और व्हाट्सएप चैट अधीनस्थ कर्मचारियों को दिखाकर दबाव बनाने का काम करते हैं। पुलिस बीट कवर करने वाले ऐसे कई चेहरे विभागीय गलियारों में भय और प्रभाव दोनों का माहौल तैयार किए हुए हैं।
स्थानीय पत्रकारों के बीच “तेरह लखिया” नाम से चर्चित एक व्यक्ति को लेकर भी तमाम चर्चाएं हैं। आरोप है कि वह पुलिस रिपोर्टिंग के नाम पर अधिकारियों के करीबी होने का रौब दिखाता है और अधीनस्थ पुलिसकर्मियों पर प्रभाव जमाने की कोशिश करता है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कलेक्ट्रेट और पुलिस दफ्तरों में यह चर्चाएं खुलेआम सुनाई देती हैं।
इसी तरह रामनगरिया मेले से जुड़े एक विवादित अधिकारी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि वह 24 घंटे आला अधिकारियों के आसपास सक्रिय रहता है, जिसके चलते उसके खिलाफ शिकायत लेकर आने वाले लोग निराश होकर लौट जाते हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि अधिकारियों तक वास्तविक समस्याएं पहुंचने से पहले ही “सेटिंग तंत्र” सक्रिय हो जाता है।
सबसे बड़ा नुकसान वास्तविक पत्रकारिता को हो रहा है। जिले के कई वरिष्ठ और जमीनी पत्रकार अब कलेक्ट्रेट और प्रशासनिक कार्यक्रमों से दूरी बनाने लगे हैं। उनका मानना है कि जब पत्रकारिता की जगह चाटुकारिता और दबाव की संस्कृति हावी हो जाए, तब जनसरोकार आधारित सवाल पूछना लगभग असंभव हो जाता है।
यह स्थिति तब है जब योगी आदित्यनाथ लगातार सुशासन, शुचिता और जीरो टॉलरेंस की नीति की बात कर रहे हैं। सवाल यह है कि यदि प्रशासनिक परिसरों में ही कथित दलाली तंत्र और प्रभावशाली नेटवर्क सक्रिय रहेंगे, तो सरकार की मंशा जमीन पर कैसे उतरेगी? जनता अब यह जानना चाहती है कि क्या प्रशासन ऐसे तत्वों की पहचान कर पारदर्शी व्यवस्था लागू करेगा या फिर कलेक्ट्रेट परिसर यूं ही “माइक और प्रभाव” की राजनीति का अड्डा बना रहेगा।


