(मनोज कुमार अग्रवाल -विभूति फीचर्स)
महिलाओं में होने वाली सबसे सामान्य हार्मोनल समस्याओं में से एक पीसीओएस यानि पॉलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम को अब कई विशेषज्ञ पीएमओएस पॉलीमेटाबालिक ओवरी सिंड्रोम के नाम से संबोधित करने लगे हैं। यह बदलाव इस बात को दर्शाता है कि यह समस्या केवल ओवरी तक सीमित नहीं है, बल्कि शरीर के मेटाबॉलिज्म और हार्मोनल संतुलन को भी प्रभावित करती है।
नाम बदलने की आवश्यकता क्यों पड़ी? लब्ध प्रतिष्ठ होम्योपैथी चिकित्सक डॉ. ऋद्धि अग्रवाल ने इस संबंध में बताया कि पहले पीसीओएस को मुख्य रूप से ओवरी में सिस्ट और अनियमित पीरियड्स से जोड़कर देखा जाता था। लेकिन अब डॉक्टरों और शोधकर्ताओं का मानना है कि कई महिलाओं में पीसीओएस के लक्षण होते हैं, जबकि ओवरी में सिस्ट नहीं पाए जाते। यह समस्या शरीर में कई प्रकार के मेटाबॉलिक बदलावों से जुड़ी होती है, जैसे इंसुलिन रेजिस्टेंस,वजन बढ़ना,हार्मोनल असंतुलन,
मुंहासे,बाल झड़ना,प्रजनन संबंधी समस्याएं,डायबिटीज और लाइफस्टाइल बीमारियों का बढ़ता खतरा। इसी कारण पीएमओएस शब्द को अधिक उपयुक्त माना जा रहा है।
पुराने नाम पीसीओएस से अक्सर लोगों को लगता था कि यह सिर्फ महिलाओं के प्रजनन अंगों या सिस्ट की बीमारी है। अब नए नाम पीएमओएस से यह स्पष्ट होता है कि यह एंडोक्राइन (अंतःस्रावी ग्रंथियों) और मेटाबॉलिज्म से जुड़ी बीमारी है, जिससे निदान में तेजी आएगी और टाइप-2 डायबिटीज, मोटापा व दिल की बीमारियों जैसे खतरों पर बेहतर ध्यान दिया जा सकेगा। इसके प्रमुख लक्षण अनियमित मासिक धर्म या अधिक रक्तस्राव,वजन का तेजी से बढ़ना और कम करने में अत्यधिक कठिनाई, चेहरे पर मुंहासे और असामान्य रूप से बालों का उगना है।
चूंकि यह एक मेटाबॉलिक सिंड्रोम है, इसलिए जीवनशैली में बदलाव इसका सबसे बड़ा उपचार है। खान-पान का ध्यान रखें। प्रोसेस्ड फूड और चीनी से बचें। ब्लड शुगर नियंत्रित रखने के लिए फाइबर और प्रोटीन से भरपूर आहार लें। नियमित रूप से व्यायाम और योग को दिनचर्या में शामिल करें। 5 से 10 प्रतिशत वजन घटाने से भी हार्मोन्स में काफी सुधार देखा जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, तनाव, खराब खानपान, शारीरिक गतिविधियों की कमी और अनियमित दिनचर्या के कारण किशोरियों और युवा महिलाओं में हार्मोनल असंतुलन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
इसके सामान्य लक्षण हैं अनियमित या मिस्ड पीरियड्स,अचानक वजन बढ़ना,चेहरे पर अधिक बाल आना ,लगातार मुंहासे,बाल पतले होना,थकान और मूड स्विंग्स।
डॉक्टर महिलाओं को सलाह देते हैं कि ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज न करें और समय पर चिकित्सकीय सलाह लें।
डाॅ.ऋद्धि अग्रवाल के अनुसार पीएमओएस में होम्योपैथी की भूमिका काफी सहज और बेहतर परिणाम देती है। इस चिकित्सा पद्धति का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह साइड इफेक्ट यानि कोई दुष्प्रभाव नही डालती है यही कारण है कि आजकल होम्योपैथी को पीएमओएस के लिए एक समग्र और सहायक उपचार पद्धति माना जा रहा है। यह केवल लक्षणों को दबाने के बजाय व्यक्ति के संपूर्ण हार्मोनल, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर ध्यान देती है।
होम्योपैथिक उपचार में रोगी की शारीरिक और मानसिक स्थिति को समझकर उपचार योजना बनाई जाती है। इसका उद्देश्य शरीर के प्राकृतिक संतुलन को बेहतर बनाना और संपूर्ण स्वास्थ्य को सहयोग देना होता है। डाॅ. ऋद्धि के अनुसार होम्योपैथी निम्न क्षेत्रों में सहायक हो सकती है-
हार्मोनल संतुलन सुधारने में मदद,पीरियड्स की अनियमितता को कम करने में सहायता, तनाव से जुड़ी समस्याओं को कम करने में मदद, शरीर के मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को समर्थन देना और मुंहासों और बालों से संबंधित समस्याओं में प्राकृतिक सहायता। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन लंबे समय तक हार्मोनल स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पीएमओएस के प्रति जागरूकता अभी भी काफी कम है, विशेषकर छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में। समय पर पहचान और सही प्रबंधन से प्रजनन संबंधी समस्याओं, मोटापा, डायबिटीज और मानसिक तनाव जैसी जटिलताओं से बचा जा सकता है।
महिलाओं के स्वास्थ्य में पीएमओएस को केवल ओवरी की समस्या नहीं, बल्कि पूरे शरीर के मेटाबॉलिक स्वास्थ्य से जुड़ी स्थिति के रूप में देखा जाना चाहिए।
आधुनिक चिकित्सा शोध लगातार स्वास्थ्य मे बेहतरी की दिशा में आगे जारी है। इसके लिए चिकित्सकों का नवीनतम ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण है ताकि शोध के अनुसार इलाज दिया जाए। (विभूति फीचर्स)
मेटाबॉलिक नजरिए से समझें महिलाओं की सबसे आम हार्मोनल समस्या


