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Friday, May 1, 2026

कविता

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जर्जर कश्ती हो गई, अंधे खेवनहार,
खतरे में ‘सौरभ’ दिखे, जाना सागर पार॥

लहरों का प्रहार है, उठता बारंबार,
डगमग करती नाव में, टूटे हर आधार।
दिशा सभी है धुंधली, और है अंधकार—
जर्जर कश्ती हो गई, अंधे खेवनहार॥

मंझधारों के बीच में, बढ़ता है संहार,
डूबे सपनों की यहाँ, होती है पुकार।
साहस की पतवार ही, दे सकती उद्धार—
जर्जर कश्ती हो गई, अंधे खेवनहार॥

जब-जब हिम्मत टूटती, मन होता लाचार,
विश्वासों की डोर से, जुड़ता फिर संसार।
सत्य दीप बन जल उठे, मिटे हर अंधकार—
जर्जर कश्ती हो गई, अंधे खेवनहार॥

जागो हे नाविक जरा, पहचानो मंझधार,
सही दिशा में मोड़ दो, जीवन की पतवार।
तभी सुरक्षित हो सके, ये जीवन विस्तार—
जर्जर कश्ती हो गई, अंधे खेवनहार॥

— डॉ. सत्यवान सौरभ

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