शरद कटियार
23 अप्रैल को दुनियाभर में मनाया जाने वाला विश्व पुस्तक दिवस केवल एक औपचारिक दिवस नहीं, बल्कि ज्ञान, विचार और समाज की दिशा तय करने वाले सबसे शक्तिशाली माध्यम—किताबों—की याद दिलाने का दिन है। लेकिन सवाल यह है कि क्या आज की युवा पीढ़ी किताबों से दूर होती जा रही है?
दरअसल, इस दिन को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने का श्रेय यूनेस्को को जाता है, जिसने 1995 में इस दिन को आधिकारिक मान्यता दी। 23 अप्रैल का चयन भी प्रतीकात्मक है इसी दिन महान साहित्यकार विलियम शेक्सपियर और मिगुएल दे सर्वेंटिस का निधन हुआ था।
आज जब सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो और त्वरित कंटेंट का दौर है, तब किताबों की गंभीरता और गहराई कहीं पीछे छूटती नजर आ रही है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत में 15 से 25 वर्ष के युवाओं में नियमित किताब पढ़ने की आदत पिछले एक दशक में लगभग 40% तक घट गई है। वहीं, मोबाइल स्क्रीन टाइम औसतन 6 से 8 घंटे तक पहुंच चुका है।
यही कारण है कि विश्व पुस्तक दिवस अब सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि चेतावनी बनता जा रहा है—अगर पढ़ने की संस्कृति कमजोर हुई, तो सोचने और समझने की क्षमता भी सीमित हो जाएगी।
किताबें सिर्फ ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की रीढ़ होती हैं। इतिहास गवाह है कि बड़े बदलावों की शुरुआत किताबों से ही हुई। चाहे स्वतंत्रता आंदोलन हो या सामाजिक क्रांति,हर जगह किताबों ने विचारों को जन्म दिया।
लेकिन आज के युवाओं के सामने सबसे बड़ा संकट है,धैर्य की कमी। डिजिटल कंटेंट तुरंत संतुष्टि देता है, जबकि किताबें समय और ध्यान मांगती हैं। यही कारण है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में भी गहराई से पढ़ने की क्षमता कमजोर होती जा रही है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल करीब 90,000 से अधिक नई किताबें प्रकाशित होती हैं, लेकिन लाइब्रेरी सिस्टम और पठन संस्कृति उतनी तेजी से विकसित नहीं हो पा रही। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में कई जिलों में सार्वजनिक पुस्तकालय या तो बंद पड़े हैं या संसाधनों के अभाव में दम तोड़ रहे हैं यह प्रशासनिक उदासीनता का भी बड़ा संकेत है।
विश्व पुस्तक दिवस युवाओं के लिए एक मौका है खुद से सवाल पूछने का कि क्या वे केवल सूचना ले रहे हैं या वास्तविक ज्ञान अर्जित कर रहे हैं?
अगर समाज को मजबूत बनाना है, तो किताबों से रिश्ता फिर से मजबूत करना होगा। क्योंकि स्क्रीन आपको अपडेट कर सकती है, लेकिन किताबें आपको विकसित करती हैं।
आज एक किताब उठाइए क्योंकि एक अच्छी किताब न सिर्फ आपकी सोच बदल सकती है, बल्कि आपका भविष्य भी तय कर सकती है।
विश्व पुस्तक दिवस: डिजिटल दौर में किताबों की घटती पकड़ चिंतनीय


