– अमृतपुर में सबसे ज्यादा असर
फर्रुखाबाद। जनपद में मतदाता सूची के पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद सामने आए आंकड़ों ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। शहरी क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या घटने और ग्रामीण इलाकों में बढ़ोतरी से आने वाले चुनावों में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदलने के संकेत मिल रहे हैं। खासकर अमृतपुर विधानसभा क्षेत्र में इसका व्यापक असर देखने को मिल रहा है।
आंकड़ों के मुताबिक जनपद की चार विधानसभा सीटों में कुल 2.23 लाख से अधिक मतदाता कम हुए हैं। पहले जहां कुल मतदाता 13,98,009 थे, वहीं अब यह संख्या घटकर 11,74,905 रह गई है। इस बदलाव ने सभी राजनीतिक दलों की रणनीति पर सीधा असर डाला है।
विधानसभा वार आंकड़ों पर नजर डालें तो कायमगंज में 43,865, अमृतपुर में 46,065, फर्रुखाबाद में 91,425 और भोजपुर में 41,749 मतदाता कम हुए हैं। इनमें सबसे अधिक गिरावट फर्रुखाबाद सदर सीट पर दर्ज की गई है, जबकि अमृतपुर क्षेत्र भी बड़े बदलाव के दायरे में है।
विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी मतदाताओं की कमी और ग्रामीण वोटरों के बढ़ते प्रभाव से चुनावी रुझान बदल सकता है। अब तक शहरी वोट बैंक को मजबूत मानने वाले दलों को अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ेगा, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में पकड़ मजबूत करने वाले दलों को इसका लाभ मिल सकता है।
जानकारी के अनुसार बड़ी संख्या में शहरी मतदाताओं ने अपने नाम गांवों में स्थानांतरित कराए हैं। इसके पीछे पंचायत स्तर पर वोटिंग की अधिक सक्रियता और स्थानीय जुड़ाव को प्रमुख कारण माना जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत अधिक होने से राजनीतिक दल अब गांवों की ओर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
इस बदलाव से भाजपा, सपा सहित अन्य दलों में चिंता बढ़ गई है। सभी दल अब नए मतदाता डेटा के आधार पर अपनी रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह बदलाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चुनावी नतीजों को सीधे प्रभावित कर सकता है।
वहीं, यह भी सामने आया है कि पहले कुछ मामलों में डबल वोट (दो जगह नाम दर्ज) का भी खेल चलता था, जिसे अब काफी हद तक खत्म कर दिया गया है। इससे मतदाता सूची अधिक पारदर्शी हुई है, लेकिन इससे कई दलों के समीकरण बिगड़ गए हैं।
अब सभी की नजर आगामी चुनावों पर टिकी है, जहां यह देखना दिलचस्प होगा कि बदले हुए मतदाता आंकड़े किस दल के पक्ष में जाते हैं और किसके लिए चुनौती बनते हैं।
शहरी वोटरों में कमी, गांवों में बढ़ी संख्या से बदलेगा सियासी गणित


