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Sunday, October 4, 2026

फर्रुखाबादनामा: पाँचाल से फर्रुखाबाद तक (अंक – 04)

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जहां ऋषियों की साधना से पावन हुई गंगा: दक्षिण पाँचाल का प्राचीन तीर्थ श्रृंगीरामपुर

परिकल्पना एवं संपादन: मोहम्मद आक़िब खांन
प्रस्तुति: यूथ इंडिया

फर्रुखाबाद: गंगा नदी के पवित्र तट पर बसा श्रृंगीरामपुर अति-प्राचीन, ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल है। फर्रुखाबाद जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह क्षेत्र धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। फर्रुखाबाद का पूरा अंचल ऐतिहासिक व पौराणिक गाथाओं से समृद्ध है, जहाँ जगह-जगह अनेकों ऋषि-मुनियों के आश्रम आज भी मौजूद हैं। जनपद की सीमा में कम्पिल से लेकर खुदागंज तक बहती पतित-पावनी गंगा के तट पर प्राचीन काल में अनेक ऋषियों ने साधना की है, जिसमें श्रृंगीरामपुर अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह स्थल महर्षि विभांडक के पुत्र महर्षि श्रृंगी की तपोभूमि रहा है, जिनका वर्णन वाल्मीकि रचित रामायण और महाभारत दोनों ही महाकाव्यों में प्रमुखता से मिलता है।

मान्यता है कि सिर पर श्रृंग होने के कारण पिता विभांडक ने इनका नाम ‘श्रंगय’ रखा था। घोर तपस्या के पश्चात् इसी स्थान पर श्रृंगी ऋषि ने अपने श्रृंगों का परित्याग किया, जिसके बाद से यह स्थल पवित्र तीर्थ के रूप में विख्यात हो गया। श्रृंगीरामपुर का रामायण काल से सीधा और अटूट संबंध है।

अयोध्यापति राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति के लिए जिस ऐतिहासिक पुत्रेष्टि यज्ञ का आयोजन किया था, उसके मुख्य पुरोहित महर्षि श्रृंगी ही थे। उनके दिव्य मंत्रोच्चार और यज्ञ-प्रभाव के स्वरूप ही भगवान श्री राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ था।

धार्मिक परंपराओं और आस्था के केंद्र के रूप में यहाँ महर्षि श्रृंगी और उनकी पत्नी माता शांता, जो अंगदेश के राजा रोमपाद की दत्तक पुत्री व राजा दशरथ की पुत्री थीं, का प्राचीन मंदिर स्थित है। इस धाम में श्रद्धालुओं द्वारा पूजन एवं जलाभिषेक का विशेष महत्व है। जनश्रुति है कि यहाँ से गंगाजल ले जाकर विभिन्न ज्योतिर्लिंगों पर चढ़ाने से असीम पुण्य फल की प्राप्ति होती है। इसी मान्यता के कारण प्रतिवर्ष यहाँ दो बार विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें हजारों कांवड़िये पवित्र गंगाजल भरकर भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करने प्रस्थान करते हैं। यहाँ भगवान शिव का भी प्राचीन मंदिर विद्यमान है, जहाँ कार्तिक पूर्णिमा, गंगा दशहरा तथा महाशिवरात्रि जैसे पावन पर्वों पर दूर-दराज़ से लाखों श्रद्धालु स्नान और दर्शन हेतु एकत्र होते हैं।

पौराणिक महत्व के साथ-साथ यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से ग्वालियर के महाराजा सिंधिया के राज्य का भी अभिन्न अंग रहा है। सिंधिया राज्य की ओर से गंगा पूजन तथा नियमित धार्मिक अनुष्ठानों के संचालन के लिए यहाँ एक गद्दी स्थापित की गई थी, जो आज भी “महंत की गद्दी” के नाम से जानी जाती है। इस गद्दी के समीप ही ग्वालियर राज्य द्वारा निर्मित सुंदर घाट, प्राचीन शिव मंदिर तथा एक ऐतिहासिक हवेली स्थित है, जो इसके समृद्ध अतीत की साक्षी है।

श्रृंगीरामपुर के आध्यात्मिक वैभव की परिधि केवल यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लगभग 5 किलोमीटर के दायरे में च्यवन ऋषि, धौम्य ऋषि और आरुणि उद्दालक ऋषि के प्राचीन आश्रम भी स्थित हैं, जो इस पूरे अंचल को वैदिक काल से ही महान साधना केंद्र के रूप में प्रमाणित करते हैं। वैदिक युग में जब यह पूरा क्षेत्र दक्षिण पाँचाल के अंतर्गत आता था, तब गंगा किनारे स्थित यह तपोभूमि ज्ञान, दर्शन और चेतना की मुख्य धारा थी।

श्रृंगीरामपुर केवल ईंट-पत्थरों और प्राचीन घाटों की धरोहर नहीं, बल्कि भारतीय अध्यात्म, धर्म और इतिहास की सजीव अंतर्धारा है। पाँचाल कालीन वैदिक परंपराओं से लेकर रामायण काल के पुत्रेष्टि यज्ञ और आधुनिक काल तक, इस क्षेत्र ने हर युग में अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक अस्मिता को जीवंत रखा है। ऋषियों की इस पावन तपोभूमि की रक्षा और इसके पौराणिक महत्व का संवर्धन न केवल फर्रुखाबाद, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना को समृद्ध और अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

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