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Saturday, August 1, 2026

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या अश्लीलता का महिमामंडन?

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— डॉ. प्रियंका सौरभ
जंतर-मंतर लोकतांत्रिक भारत का वह सार्वजनिक मंच है जहाँ नागरिक अपनी बात सरकार और समाज तक पहुँचाने के लिए एकत्र होते हैं। यह स्थान संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक है। लेकिन जब किसी विरोध प्रदर्शन में भाषा की मर्यादा टूट जाती है, गाली-गलौज को प्रतिरोध का औजार बना दिया जाता है और अश्लीलता को साहस का पर्याय बताकर उसका उत्सव मनाया जाने लगता है, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा क्या है? क्या लोकतंत्र में विरोध का अर्थ हर प्रकार की भाषा और व्यवहार को वैध ठहराना है? या फिर स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ है?
हाल के दिनों में जंतर-मंतर पर कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा सार्वजनिक रूप से अत्यंत आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग चर्चा का विषय बना। इस पर समाज का एक वर्ग इसे “पितृसत्ता के विरुद्ध विद्रोह” और “निर्भीक स्त्री की आवाज़” बताकर समर्थन करता दिखाई दिया। दूसरी ओर अनेक लोगों ने इसे सामाजिक मर्यादा, सार्वजनिक शालीनता और संवैधानिक जिम्मेदारी के विरुद्ध माना। यह बहस केवल किसी एक घटना की नहीं, बल्कि उस दिशा की है जहाँ समाज अभिव्यक्ति की सीमाओं को पुनर्परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। लेकिन यही संविधान अनुच्छेद 19(2) के माध्यम से यह भी स्पष्ट करता है कि यह स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार, नैतिकता, मानहानि, न्यायालय की अवमानना और राष्ट्र की सुरक्षा जैसे आधारों पर इस स्वतंत्रता पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। अर्थात संविधान स्वयं यह स्वीकार करता है कि स्वतंत्रता और जिम्मेदारी साथ-साथ चलती हैं।
किसी भी लोकतंत्र में विरोध का अधिकार आवश्यक है। सरकार की आलोचना, नीतियों पर प्रश्न और असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था की शक्ति हैं। लेकिन यदि विरोध की भाषा समाज में घृणा, अश्लीलता या हिंसक मानसिकता को बढ़ावा देने लगे तो उसका मूल्यांकन केवल “स्वतंत्र अभिव्यक्ति” के आधार पर नहीं किया जा सकता। सार्वजनिक जीवन में प्रयुक्त भाषा समाज की संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों पर भी प्रभाव डालती है।
यह भी विचारणीय है कि यदि कोई पुरुष सार्वजनिक मंच से उसी प्रकार की भाषा का प्रयोग करे, तो क्या समाज और कानून की प्रतिक्रिया वही होगी जो किसी महिला के मामले में होती है? यदि उत्तर “नहीं” है, तो यह समानता के सिद्धांत के अनुरूप नहीं माना जा सकता। समान अधिकारों का अर्थ समान उत्तरदायित्व भी है। यदि कानून किसी पुरुष द्वारा की गई अश्लील या आपत्तिजनक अभिव्यक्ति पर कार्रवाई करता है, तो वही मानक महिलाओं पर भी लागू होना चाहिए। इसी प्रकार यदि किसी महिला के विरुद्ध अनुचित भाषा स्वीकार्य नहीं है, तो पुरुषों के विरुद्ध भी वैसी भाषा को सामान्य नहीं बनाया जाना चाहिए।
आज सामाजिक विमर्श में एक चिंता यह भी है कि कभी-कभी वैचारिक प्रतिबद्धताएँ निष्पक्षता पर भारी पड़ जाती हैं। यदि किसी घटना का मूल्यांकन व्यक्ति के विचार, राजनीतिक झुकाव या लिंग के आधार पर किया जाएगा, तो न्याय और समानता दोनों प्रभावित होंगे। किसी भी पक्ष का अंध-समर्थन लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है। व्यक्ति नहीं, व्यवहार और सिद्धांत मूल्यांकन का आधार होने चाहिए।
पितृसत्ता, लैंगिक असमानता और महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय वास्तविक सामाजिक प्रश्न हैं। इनके विरुद्ध संघर्ष भी आवश्यक है। लेकिन यह संघर्ष यदि गरिमा, तर्क और संवैधानिक मर्यादा के साथ चले तो उसका नैतिक बल अधिक होता है। अश्लील भाषा या अपमानजनक व्यवहार को केवल इसलिए उचित नहीं ठहराया जा सकता कि उसका उद्देश्य किसी व्यवस्था का विरोध है। उद्देश्य जितना महत्वपूर्ण है, साधन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
सोशल मीडिया के दौर में उत्तेजक भाषा तुरंत वायरल हो जाती है। इससे कई बार ऐसा भ्रम पैदा होता है कि जितनी अधिक आक्रामक या विवादास्पद अभिव्यक्ति होगी, उतनी ही प्रभावी मानी जाएगी। जबकि लोकतंत्र का वास्तविक सौंदर्य विचारों की शक्ति में है, न कि शब्दों की कटुता में। इतिहास बताता है कि स्थायी परिवर्तन तर्क, संवाद और नैतिक साहस से आते हैं, केवल उत्तेजना से नहीं।
कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं। यही भारतीय गणराज्य की मूल भावना है। इसलिए यदि सार्वजनिक स्थानों पर अभद्र भाषा, अश्लील प्रदर्शन या किसी वर्ग के प्रति अपमानजनक वक्तव्य कानून के दायरे में अपराध की श्रेणी में आते हैं, तो उनका आकलन व्यक्ति की पहचान देखकर नहीं, बल्कि उसके आचरण के आधार पर होना चाहिए। समानता का अर्थ विशेष छूट नहीं, बल्कि समान मानदंड है।
यह भी आवश्यक है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और घृणास्पद या अश्लील भाषण के बीच स्पष्ट सामाजिक और कानूनी समझ विकसित हो। न्यायालय समय-समय पर यह कह चुके हैं कि असहमति लोकतंत्र का आधार है, लेकिन यह असहमति हिंसा, घृणा या सार्वजनिक शिष्टाचार के उल्लंघन का माध्यम नहीं बन सकती। अतः यदि कानूनों में कहीं अस्पष्टता है, तो उस पर व्यापक सार्वजनिक विमर्श और आवश्यक कानूनी सुधार किए जा सकते हैं, ताकि नागरिकों को स्पष्ट दिशा मिल सके।
समाज को भी आत्ममंथन करना होगा। क्या हम अपने बच्चों को यह सिखाना चाहते हैं कि साहस का अर्थ मर्यादा छोड़ देना है? क्या निर्भीकता का अर्थ भाषा की गरिमा समाप्त कर देना है? या फिर वास्तविक साहस वह है जो कटु परिस्थितियों में भी अपने विचारों को संयम, स्पष्टता और दृढ़ता के साथ रख सके?
लोकतंत्र में असहमति का सम्मान होना चाहिए, परंतु सार्वजनिक जीवन की गरिमा भी उतनी ही आवश्यक है। यदि हम समानता की बात करते हैं तो समान उत्तरदायित्व भी स्वीकार करना होगा। कानून का व्यवहार व्यक्ति के लिंग, विचारधारा या सामाजिक पहचान के अनुसार नहीं, बल्कि उसके कृत्य के अनुसार होना चाहिए। यही संविधान की भावना है और यही न्याय का आधार भी।
अंततः प्रश्न केवल जंतर-मंतर की किसी एक घटना का नहीं है। प्रश्न यह है कि हम आने वाले भारत की सार्वजनिक संस्कृति कैसी बनाना चाहते हैं। ऐसा भारत जहाँ अभिव्यक्ति स्वतंत्र हो, पर जिम्मेदार भी; जहाँ विरोध निर्भीक हो, पर मर्यादित भी; और जहाँ समानता का अर्थ सभी के लिए समान अधिकारों के साथ समान दायित्व भी हो। यही लोकतंत्र की परिपक्वता है और यही संविधान की वास्तविक आत्मा।
  (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

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