– यह अनुशासन का पाठ पढ़ने वाली पार्टी की नई दिशा है या कार्यकर्त्ता की खीज
– कागजोँ में विकास का भूत है या जिम्मेदारों की अपनों से दूरी अथवा सत्तामद
– शरद कटियार
जिस भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) ने वर्षों तक खुद को अनुशासन में रहने वाली, कहीं न जाने वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया, आज उसी पार्टी में अनुशासन (discipline) अवतार लेता हुआ सड़कों पर उतर आया है। हालात ऐसे हैं कि माननीय शब्द की मर्यादा ही मिटती दिख रही है—और यह सब किसी विपक्ष ने नहीं, भाजपा के अपने विधायक और उनके समर्थकों ने किया है।
वरिष्ठ मंत्री स्वतंत्र देव सिंह को सार्वजनिक रूप से घेरना और सत्ता के भीतर असहमति को सड़क तक ले आना यह बताता है कि पार्टी के भीतर आदेश–अनुशासन की श्रृंखला कमजोर पड़ चुकी है। जो काम कभी संगठन के भीतर संवाद से सुलझाए जाते थे, वे अब दबाव, प्रदर्शन और शक्ति-प्रदर्शन के रूप में सामने आ रहे हैं।
यह सिर्फ एक मंत्री–विधायक का टकराव नहीं है। यह उस जवाबदेही संकट का परिणाम है, जहां फाइलों में विकास पूरा है, लेकिन ज़मीन पर सड़कें टूटी हैं, पानी नहीं है और योजनाएं अधूरी हैं। यह उसे जवाब दे ही संकट का परिणाम है जहां जिम्मेदार अपना को ही अनदेखा कर रहे हैं या फिर सत्ता मद है,जो नेता जितने सरल थे आज वह मिलते तो प्रेम पूर्वक हैं लेकिन अगर वह कम सुन ले तो वैसे भी बुलाते हैं जैसे उन्हें ततैया मिर्च का आभास हो गया हो।विधायक रोज़ जनता के सवालों से घिरते हैं,मंत्री काग़ज़ी प्रगति के भरोसे रहते हैं। नतीजा.. जनाक्रोश का भार सत्ता के भीतर फूट बनकर फटता है।
सबसे चिंताजनक यह है कि माननीय की परिभाषा जो लोकतांत्रिक गरिमा का प्रतीक होती है,वह भीड़ और शोर में गुम हो गई। समर्थकों की मौजूदगी में सार्वजनिक अपमान का दृश्य यह संकेत देता है कि संगठनात्मक नियंत्रण ढीला पड़ा है। जिस अनुशासन का हवाला देकर विपक्ष पर उंगली उठाई जाती थी, वही आज अपने घर में सवालों के घेरे में है। मंत्री का घेराव और नाराज कार्यकर्ताओं की उनसे धक्का मुक्की, तो चौंकाने वाली ही दिखाई दी, सुरक्षा कर्मी ना होते तो शायद मा…. जी का कुर्ता ही चीर-चीर हुआ मिलता। राजनीतिक संकेत साफ हैं, सत्ता और संगठन के बीच तालमेल में दरार है।
योजनाओं की गुणवत्ता, निगरानी और क्रियान्वयन पर भरोसा कमजोर हुआ है।कार्यकर्ताओं, शुभचिंतकों की सनी नहीं हो रही भाजपा के जिन नेताओं के यहां उनके किराये के छोटे मकानों में पहले गणमान्य जनता का चाय- पानी से अभिवादन होता था, अब बड़ी सरकारी कोठियों में प्लास्टिक की कुर्सी पर खुले में बैठ कर गुड खिलाकर टरकाया जाता है वह गुड भी काली, गन्दी सी और महीनों की रखी सी होती है!
चुनावी दबाव बढ़ते ही अंदरूनी असंतोष सड़क पर दिखने लगा है। अनुशासन नारे से नहीं, संवाद, जवाबदेही और परिणाम से टिकता है। अगर विकास की खाई पाटी नहीं गई और माननीय की मर्यादा बहाल नहीं हुई, तो अनुशासन का यह ‘अवतार’ और उग्र होगा—और राजनीति की कीमत अंततः जनमत!


