नई दिल्ली/हेलसिंकी: दुनियाभर में युवाओं की खुशहाली को लेकर आई विश्व खुशहाली रिपोर्ट 2026 ने एक अहम ट्रेंड उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया से दूरी बनाने या उसका सीमित उपयोग करने वाले युवा मानसिक रूप से अधिक संतुष्ट और खुश पाए गए हैं, जबकि अधिक समय डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बिताने वालों में तनाव और असंतोष की भावना अधिक देखी गई है।
रिपोर्ट, जिसे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय का वेलबीइंग रिसर्च सेंटर ने प्रकाशित किया है, बताती है कि 25 वर्ष से कम उम्र के युवाओं में सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग उनके जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है। डिजिटल दुनिया का दबाव, तुलना की प्रवृत्ति और लगातार ऑनलाइन बने रहने की मजबूरी उनके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल रही है।
अध्ययन के मुताबिक, अमेरिका और यूरोप के कॉलेज छात्रों के बीच यह भावना तेजी से बढ़ रही है कि वे सोशल मीडिया के बिना अधिक शांत और संतुलित जीवन जी सकते हैं। कई छात्र यह मानते हैं कि वे इन प्लेटफॉर्म्स का उपयोग केवल सामाजिक दबाव के कारण करते हैं, न कि अपनी वास्तविक जरूरत के चलते।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि जिन देशों में सोशल मीडिया के उपयोग पर सख्त नियंत्रण या प्रतिबंध हैं, वहां के युवा अपेक्षाकृत अधिक संतुष्ट पाए गए हैं। ऐसे देशों में युवा वास्तविक जीवन के रिश्तों, परिवार, खेलकूद और सामाजिक गतिविधियों को अधिक समय देते हैं, जिससे उनकी खुशहाली का स्तर बेहतर रहता है।
वैश्विक रैंकिंग की बात करें तो फिनलैंड एक बार फिर दुनिया का सबसे खुशहाल देश बना है। लगातार नौवें वर्ष शीर्ष स्थान हासिल करने वाला फिनलैंड सामाजिक सुरक्षा, समानता, भरोसेमंद संस्थाओं और बेहतर जीवन स्तर के लिए जाना जाता है।
इसके अलावा आइसलैंड, डेनमार्क, स्वीडन और नॉर्वे जैसे नॉर्डिक देश भी शीर्ष-10 में शामिल हैं। इन देशों की सफलता के पीछे मजबूत कल्याणकारी नीतियां, सामाजिक समानता और उच्च जीवन प्रत्याशा जैसे कारक माने जाते हैं।
रिपोर्ट में भारत की स्थिति में हल्का सुधार देखने को मिला है। 147 देशों की सूची में भारत 116वें स्थान पर रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में दो स्थान बेहतर है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि देश में अभी भी सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कई मुद्दों पर काम करने की जरूरत है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में तेजी से बढ़ती डिजिटल खपत और वास्तविक सामाजिक संबंधों के बीच असंतुलन युवाओं की खुशहाली को प्रभावित कर रहा है। लंबे समय तक स्क्रीन पर बिताया गया समय न केवल मानसिक स्वास्थ्य, बल्कि नींद और शारीरिक गतिविधियों पर भी असर डाल रहा है।
रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग युवाओं में चिंता, अवसाद और अकेलेपन की भावना को बढ़ा सकता है। ऐसे में संतुलित डिजिटल उपयोग और वास्तविक जीवन के रिश्तों को मजबूत बनाना बेहद जरूरी है।
दूसरी ओर, वैश्विक सूची में सबसे निचले पायदान पर अफगानिस्तान, सिएरा लियोन और मलावी जैसे देश रहे, जहां लंबे समय से संघर्ष, गरीबी और अस्थिरता का असर लोगों की खुशहाली पर पड़ा है।
रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि खुशहाली केवल आर्थिक समृद्धि पर निर्भर नहीं करती। सामाजिक समर्थन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, स्वास्थ्य सेवाएं और जीवन में उद्देश्य की भावना जैसे कारक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
कोस्टा रिका का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट बताती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद सामाजिक जुड़ाव और संतुलित जीवनशैली लोगों को अधिक खुश बना सकती है। यहां लोग तकनीक से ज्यादा प्रकृति, परिवार और समुदाय को प्राथमिकता देते हैं।
ऑक्सफोर्ड के अर्थशास्त्री जान-इमैनुअल डी नेवे के अनुसार, जिन देशों में सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं और लोग एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं, वहां खुशहाली का स्तर स्वाभाविक रूप से अधिक होता है।
रिपोर्ट यह संकेत देती है कि डिजिटल युग में भी खुश रहने का मूल मंत्र संतुलन है। सोशल मीडिया का सीमित उपयोग, मजबूत सामाजिक रिश्ते और स्वस्थ जीवनशैली ही बेहतर मानसिक स्वास्थ्य और खुशहाल जीवन की कुंजी बन सकते हैं।


