मुंबई/बारामती: महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा शून्य छोड़ गए”अजित पवार” (Ajit Pawar) के असामयिक निधन के बाद अब सबसे बड़ा सवाल उनकी राजनीतिक विरासत को लेकर खड़ा हो गया है। उनके निधन से बारामती विधानसभा सीट रिक्त हो चुकी है और इसी के साथ पार्टी के भीतर उत्तराधिकार को लेकर मंथन तेज हो गया है।
राजनीतिक गलियारों में इस बात पर चर्चा है कि अजित पवार की मजबूत पकड़ वाली बारामती सीट से आगे किसे मैदान में उतारा जाए, ताकि न सिर्फ सीट बरकरार रहे बल्कि पार्टी की साख भी बनी रहे।
पार्टी सूत्रों के अनुसार फिलहाल दो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं—
पहला नाम:अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार।पार्टी का एक वर्ग मानता है कि सहानुभूति और पारिवारिक विरासत के आधार पर सुनेत्रा पवार को मैदान में उतारना राजनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकता है। इससे बारामती की जनता में भावनात्मक जुड़ाव भी बना रहेगा।
दूसरा नाम:ज्येष्ठ पुत्र पार्थ पवार।
राजनीति में रहे हैं और युवा चेहरे के तौर पर उन्हें आगे बढ़ाने की पैरवी की जा रही है। पार्टी के युवा नेता मानते हैं कि पार्थ को जिम्मेदारी देने से नई पीढ़ी के मतदाताओं में संदेश जाएगा कि नेतृत्व की कमान अगली पीढ़ी के हाथों में सौंपी जा रही है। बारामती विधानसभा सीट को महाराष्ट्र की सबसे अहम और प्रतिष्ठित सीटों में गिना जाता है। यह सीट सिर्फ चुनावी गणित नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती है। ऐसे में पार्टी कोई भी फैसला बेहद सोच-समझकर लेना चाहती है। सूत्रों का कहना है कि पार्टी नेतृत्व स्थानीय समीकरण, कार्यकर्ताओं की राय और जनता के मूड को भांपने के बाद ही अंतिम निर्णय करेगा।
पार्टी नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती
अजित पवार सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि संगठन की धुरी माने जाते थे। उनके जाने के बाद पार्टी को न सिर्फ भावनात्मक झटका लगा है, बल्कि संगठनात्मक संतुलन बनाए रखना भी बड़ी चुनौती बन गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि जल्दबाज़ी में लिया गया फैसला नुकसानदेह हो सकता है, इसलिए हर पहलू पर गहन विचार-विमर्श किया जा रहा है।
क्या कहता है राजनीतिक संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि—यदि सहानुभूति को प्राथमिकता दी गई तो सुनेत्रा पवार का नाम आगे बढ़ सकता है।
यदि भविष्य की राजनीति और युवाओं पर फोकस हुआ, तो पार्थ पवार को मौका मिल सकता है।
फिलहाल पार्टी के भीतर चर्चा जारी है और अंतिम फैसला आने में अभी वक्त लग सकता है।
अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि अजित दादा की राजनीतिक विरासत किसके हाथों सौंपी जाती है और बारामती की जनता किस नाम पर अपनी मुहर लगाती है।


