भारतीय समाज आज जिस सांस्कृतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, उसमें बच्चों और युवाओं में बढ़ती अनुशासनहीनता एक गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। यह स्थिति केवल व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे पाश्चात्य सभ्यता की अंधानुकरण प्रवृत्ति भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। समाजसेवी एवं शैक्षिक विचारक डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी का मानना है कि इस सांस्कृतिक विचलन को रोकने और भावी पीढ़ी में संस्कारों का विकास करने के लिए संस्कृत शिक्षण को अनिवार्य बनाना समय की आवश्यकता है।
डॉ. त्रिपाठी के अनुसार, संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, दर्शन और जीवन मूल्यों की संवाहक है। यदि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) और विभिन्न प्रादेशिक शिक्षा बोर्डों में कक्षा बारहवीं तक संस्कृत भाषा का शिक्षण अनिवार्य कर दिया जाए, तो विद्यार्थियों में भारतीय संस्कृति के प्रति स्वाभाविक रुचि उत्पन्न होगी। इससे उनमें नैतिकता, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे गुण विकसित होंगे।
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कुछ अंग्रेजी माध्यम विद्यालय, जिन पर पाश्चात्य और तथाकथित ईसाई मानसिकता का प्रभाव अधिक है, अनजाने या जानबूझकर भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को हाशिये पर डाल रहे हैं। यह स्थिति न केवल शिक्षा व्यवस्था के लिए, बल्कि समाज के भविष्य के लिए भी विचारणीय है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अन्य संस्कृतियों में निहित सकारात्मक विचारों को अपनाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, किंतु अपनी संस्कृति को सर्वोपरि रखना ही राष्ट्रहित में है।
भारतीय संस्कृति की विशेषता यह है कि वह स्वार्थपरता से ऊपर उठकर सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः की भावना का संदेश देती है। यह संस्कृति केवल व्यक्तिगत सुख तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के कल्याण और दुखों से मुक्ति की कामना करती है। भारतीय दर्शन पशुता नहीं, बल्कि मनुष्यता, करुणा और सह-अस्तित्व का संदेश देता है।
इसी दृष्टिकोण से डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी ने यह आग्रह किया कि यदि हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करनी है और आने वाली पीढ़ी को संस्कारवान नागरिक बनाना है, तो कक्षा बारहवीं तक संस्कृत भाषा का शिक्षण अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए। यही कदम भारतीय संस्कृति की सुरक्षा और समाज के नैतिक पुनर्निर्माण की दिशा में एक सशक्त पहल साबित हो सकता है।






