वाशिंगटन। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने एक नया मोड़ ले लिया है। राष्ट्रपति Donald Trump के हालिया आदेश के बाद दुनिया के सबसे बड़े विमानवाहक पोतों में शामिल ‘USS Gerald R. Ford’ को कैरेबियन सागर से हटाकर मध्य पूर्व भेजा जा रहा है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर बयानबाज़ी तेज है।
मध्य पूर्व में पहले से ही ‘USS Abraham Lincoln’ तैनात है। अब फोर्ड की तैनाती के बाद इस क्षेत्र में अमेरिका के दो बड़े विमानवाहक पोत और उनके साथ चलने वाले विध्वंसक जहाजों की मौजूदगी हो जाएगी। सैन्य विशेषज्ञ इसे स्पष्ट शक्ति-प्रदर्शन और रणनीतिक दबाव की नीति के रूप में देख रहे हैं।
इस घटनाक्रम की जानकारी सबसे पहले The New York Times ने दी। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए है और यह तैनाती उसी दबाव रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि अमेरिका क्षेत्र में अपनी सैन्य तैयारी को मजबूत कर संभावित जोखिमों को नियंत्रित करना चाहता है।
दो हफ्ते पहले ही अब्राहम लिंकन और तीन मिसाइल-युक्त डिस्ट्रॉयर मध्य पूर्व पहुंच चुके थे। फोर्ड की तैनाती को अचानक लिया गया निर्णय माना जा रहा है। पिछले वर्ष अक्टूबर में ट्रंप प्रशासन ने फोर्ड को भूमध्य सागर से कैरेबियन स्थानांतरित किया था, जहां वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति Nicolás Maduro के खिलाफ कार्रवाई की आशंकाओं के बीच अमेरिकी सैन्य उपस्थिति बढ़ाई गई थी।
यह कदम ट्रंप की उस घोषित सुरक्षा नीति से कुछ अलग दिखता है, जिसमें उन्होंने पश्चिमी गोलार्ध को प्राथमिकता देने की बात कही थी। हालांकि हाल ही में उन्होंने संकेत दिए थे कि यदि आवश्यक हुआ तो मध्य पूर्व में अतिरिक्त युद्धपोत भेजे जा सकते हैं। फिलहाल व्हाइट हाउस ने इस नए तैनाती आदेश पर आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।
विश्लेषकों का मानना है कि दो विमानवाहक पोतों की मौजूदगी से क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर असर पड़ सकता है। ईरान पहले ही चेतावनी दे चुका है कि किसी भी आक्रामक कदम का जवाब दिया जाएगा। ऐसे में खाड़ी क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों का बढ़ना वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति दोनों पर प्रभाव डाल सकता है।


