– चार साल में सिर्फ एक नई यूनिट
– ई-अपशिष्ट प्रबंधन नियम पर ज़मीनी अमल न के बराबर
– कैग ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में ई-कचरे (e-waste) का पहाड़ हर साल ऊंचा होता जा रहा है, लेकिन इसे संभालने वाला सिस्टम बेहद लापरवाह नजर आ रहा है। चौंकाने वाली बात ये है कि बीते चार वर्षों में पूरे प्रदेश में सिर्फ एक नई ई-वेस्ट निस्तारण यूनिट (New e-waste disposal unit) का ही पंजीकरण हुआ है। जबकि हकीकत यह है कि ई-कचरे का उत्पादन हर साल तेज़ी से बढ़ रहा है और उसका वैज्ञानिक निस्तारण न हो पाने से पर्यावरण, इंसान और जानवरों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
प्रदेश सरकार ने नवंबर 2022 में ई-अपशिष्ट प्रबंधन नियम लागू किए, लेकिन ज़मीनी अमल न के बराबर रहा। इस समय प्रदेश में कुल 117 यूनिट ही पंजीकृत हैं। इनमें से 106 केवल रिसाइक्लिंग करते हैं और 11 दोबारा उपयोग लायक बनाते हैं। सबसे ज्यादा यूनिट मेरठ, गाजियाबाद और बुलंदशहर में हैं, जबकि पूर्वांचल और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में स्थिति चिंताजनक है।
कैग ने भी सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। कानपुर, गाजियाबाद, औरैया और बलरामपुर जैसे शहरों में वर्षों से ई-कचरा बिना निस्तारण के जमा पाया गया, जो नियमों की खुली अवहेलना है। जबकि हर संग्रहकर्ता और निर्माता के लिए ई-कचरे को 180 दिन से अधिक रखने की मनाही है। स्थिति साफ है—सरकारी स्तर पर ई-कचरे को लेकर गंभीरता नहीं है। यदि तत्काल कार्रवाई नहीं हुई, तो यह संकट न केवल पर्यावरणीय आपदा बन जाएगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भारी नुकसान की वजह भी।