लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से अहम रहे हैं, लेकिन 2014 और 2017 के बाद तस्वीर बदल गई। अब मुकाबला जातियों के बजाय दो समुदायों के बीच सिमट गया है। इससे कभी सत्ता निर्धारण में अहम भूमिका निभाने वाला मुसलमान सियासी तौर पर हाशिये पर चला गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दस साल बाद अब मुसलमानों की सियासी अहमियत फिर बढ़ सकती है और यह वोट बैंक एक बार फिर यूपी की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।




