लखनऊ। प्रदेश के टाइगर रिजर्व और संरक्षित वन क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने के उद्देश्य से की जा रही चेन-लिंक और सोलर फेंसिंग पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) ने कड़ा रुख अपनाया है। समिति ने स्पष्ट किया है कि यदि ऐसे कदम वैज्ञानिक, पारिस्थितिक और विधिक कसौटियों पर खरे नहीं उतरते हैं, तो वे संरक्षण की जगह वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवास के लिए खतरा बन सकते हैं। इसी को देखते हुए सीईसी ने फेंसिंग के पर्यावरणीय प्रभाव और मानव-वन्यजीव संघर्ष पर इसकी वास्तविक प्रभावशीलता का स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन कराने का निर्देश दिया है। इसके लिए मुख्य सचिव को पत्र भेजा गया है और यह अध्ययन भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून द्वारा कराया जाएगा, जिसकी रिपोर्ट छह माह के भीतर सीईसी को सौंपी जानी है।
सीईसी ने माना है कि राज्य सरकार मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने के लिए कदम उठा सकती है, लेकिन यह आवश्यक है कि सभी कार्य अत्यधिक सावधानी, वैज्ञानिक आकलन और मौजूदा कानूनों के अनुरूप हों, ताकि वन्यजीव आवास, पारिस्थितिक संतुलन और उनकी प्राकृतिक आवाजाही बाधित न हो। समिति के पास आई शिकायतों में आरोप लगाया गया है कि दुधवा और पीलीभीत टाइगर रिजर्व समेत कई संवेदनशील क्षेत्रों में बिना समुचित पारिस्थितिक अध्ययन के बड़े पैमाने पर फेंसिंग कराई जा रही है, जो वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972, जैव विविधता अधिनियम 2002 और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है। साथ ही यह भी आरोप है कि बीते दो वित्तीय वर्षों में आपदा शमन निधि के नाम पर 100 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च की गई, जो वित्तीय अनियमितताओं की ओर इशारा करती है।
प्रदेश में दुधवा, पीलीभीत, अमानगढ़ और रानीपुर सहित कुल चार टाइगर रिजर्व हैं। वर्ष 2014 में जहां प्रदेश में बाघों की संख्या 117 थी, वहीं 2022 में यह बढ़कर 205 हो गई है। तराई क्षेत्र में बाघों और तेंदुओं की संख्या बढ़ने के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं भी बढ़ी हैं। सरकार का तर्क है कि फेंसिंग उन संवेदनशील इलाकों में की जा रही है, जहां मानव बस्तियों के पास टकराव की आशंका अधिक रहती है, लेकिन सीईसी ने फेंसिंग के डिजाइन को लेकर भी दिशा-निर्देश दिए हैं। समिति ने कहा है कि फेंसिंग ऐसी होनी चाहिए, जिससे यदि कोई वन्यजीव बाहर निकल जाए तो उसे सुरक्षित तरीके से वापस जंगल में भेजा जा सके। खासतौर पर तेंदुए को ध्यान में रखते हुए फेंसिंग को “लेपर्ड-प्रूफ” बनाने पर जोर दिया गया है।
इसके साथ ही सीईसी ने फेंसिंग परियोजनाओं की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र निगरानी समिति गठित करने की सिफारिश की है। प्रस्तावित समिति की अध्यक्षता सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी मनोज सिंह करेंगे, जबकि सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी ममता संजीव दुबे सह-अध्यक्ष होंगी। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा नामित सहायक महानिरीक्षक वन इसके सदस्य होंगे। यह समिति फेंसिंग योजना के क्रियान्वयन, उसके पारिस्थितिक प्रभाव और मानव-वन्यजीव संघर्ष पर पड़ने वाले असर की समीक्षा कर समय-समय पर सरकार और सीईसी को रिपोर्ट सौंपेगी।
प्रदेश में अब तक दुधवा टाइगर रिजर्व में 76 किलोमीटर, पीलीभीत टाइगर रिजर्व में 67 किलोमीटर, कतर्नियाघाट में 90 किलोमीटर, सुहेलवा में 21.5 किलोमीटर, बिजनौर में 10 किलोमीटर और नजीबाबाद में 5 किलोमीटर फेंसिंग कराई जा चुकी है। सुप्रीम कोर्ट की समिति के इस हस्तक्षेप के बाद प्रदेश में टाइगर रिजर्व में फेंसिंग को लेकर नीति, पारदर्शिता और वैज्ञानिक आधार पर नई बहस शुरू हो गई है।






