इटावा। शहर के मोतीगंज मोहल्ले में शुक्रवार की सुबह ऐसा हृदय विदारक दृश्य सामने आया, जिसने हर किसी को भीतर तक झकझोर दिया। एक ही परिवार के माता-पिता और उनके जवान पुत्र की अर्थियां जब एक साथ घर से उठीं तो पूरा इलाका शोक में डूब गया। गली-मोहल्लों में सन्नाटा पसरा रहा और परिजनों की चीख-पुकार से वातावरण गमगीन हो उठा। जिसने भी यह मंजर देखा, उसकी आंखें नम हो गईं और कदम स्वतः ही अंतिम यात्रा की ओर बढ़ चले।
शव यात्रा में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, रिश्तेदार, व्यापारी वर्ग और सामाजिक संगठन के लोग शामिल हुए। परिवार की बेटियां मोहिनी और इति अपने माता-पिता और भाई की अर्थियों के पीछे लगभग एक किलोमीटर तक पैदल चलती रहीं। दोनों बहनों की आंखों से बहते आंसू और उनका विलाप देख उपस्थित लोगों का कलेजा फट पड़ा। महिलाओं ने उन्हें संभालने की कोशिश की, लेकिन उनका दर्द शब्दों से परे था। पूरे मोतीगंज क्षेत्र में दिनभर शोक का माहौल बना रहा और कई लोगों ने अपने प्रतिष्ठान बंद रखकर संवेदना व्यक्त की।
शव यात्रा सबसे पहले उस स्थान पर पहुंची, जहां कारोबारी राजीव उर्फ कल्लन द्वारा मंदिर का निर्माण कार्य कराया जा रहा था। वहां श्रद्धांजलि अर्पित की गई और दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना की गई। इसके बाद अंतिम यात्रा मोक्ष धाम के लिए रवाना हुई। तीनों पार्थिव शरीरों को वाहनों के माध्यम से बकेवर-भरथना रोड स्थित ओम श्री पागल बाबा गंगासागर धाम के पंचतत्व विलयन स्थल ले जाया गया। वहां वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक विधि-विधान के बीच अंतिम संस्कार की प्रक्रिया संपन्न कराई गई।
माता-पिता की चिता को उनके बड़े पुत्र सूर्य मोहन ने मुखाग्नि दी। वहीं पुत्र शिवम की चिता को उनके चचेरे भाई उज्जवल गुप्ता उर्फ राजा ने मुखाग्नि दी। जब एक साथ तीन चिताएं प्रज्वलित हुईं तो वहां उपस्थित जनसमूह की आंखें भर आईं। कई लोग फूट-फूटकर रो पड़े। यह दृश्य इतना मार्मिक था कि लोग देर तक स्तब्ध खड़े रहे।
अंतिम संस्कार में इटावा शहर के अलावा भरथना, बकेवर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। सामाजिक और व्यापारिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की। शोकसभा में ईश्वर से दिवंगत आत्माओं की शांति और परिजनों को इस असीम दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की गई।
इस त्रासदी ने न केवल एक परिवार को बल्कि पूरे शहर को गहरे आघात में डाल दिया है। मोतीगंज की गलियों में शुक्रवार का दिन हमेशा के लिए एक दर्दनाक स्मृति बनकर रह गया, जिसे याद कर लोगों की आंखें आज भी नम हो जाती हैं।


