लखनऊ: केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी नमामि गंगे (Namami Gange) परियोजना को शुरू हुए एक दशक से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन उत्तर प्रदेश में यह योजना अब तक अपने घोषित उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर सकी है। गंगा की स्वच्छता (Cleanliness of Ganga) और अविरल धारा के लिए हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए, फिर भी प्रदेश के कई हिस्सों में गंगा आज भी सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और गंदे नालों के बोझ से जूझ रही है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में नमामि गंगे के अंतर्गत 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाएं स्वीकृत की गईं। इनमें सीवेज शोधन संयंत्र (एसटीपी), घाटों का सौंदर्यीकरण, शवदाह गृहों का आधुनिकीकरण और ग्रामीण स्वच्छता से जुड़े कार्य शामिल हैं। इसके बावजूद बड़ी संख्या में परियोजनाएं समय से पूरी नहीं हो सकीं।
प्रदेश में गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए 160 से अधिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्वीकृत किए गए थे, लेकिन इनमें से कई आज भी अधूरे हैं या पूरी क्षमता से संचालित नहीं हो पा रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में प्रतिदिन लगभग 7,500 मिलियन लीटर से अधिक सीवेज उत्पन्न होता है, जबकि चालू एसटीपी की क्षमता इससे कम है। इसका सीधा असर यह है कि आज भी दर्जनों नाले बिना शोधन के सीधे गंगा में गिर रहे हैं।
कानपुर, जिसे कभी नमामि गंगे का मॉडल शहर बताया गया, वहां अब भी कई बड़े नाले गंगा को प्रदूषित कर रहे हैं। वाराणसी में भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। कई एसटीपी परियोजनाएं तय समय से 2 से 5 वर्ष की देरी से पूरी हुईं। कुछ स्थानों पर संयंत्र बन तो गए, लेकिन सीवेज कनेक्टिविटी पूरी न होने के कारण वे पूरी क्षमता पर नहीं चल पा रहे।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में गंगा के कई हिस्सों में अब भी जैविक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) और फीकल कोलीफॉर्म का स्तर मानकों से अधिक है। इसका अर्थ है कि इन स्थानों पर गंगा का जल न तो पूरी तरह स्नान योग्य है और न ही सुरक्षित। नमामि गंगे के तहत गंगा किनारे बसे 5 हजार से अधिक गांवों को खुले में शौच मुक्त घोषित किया गया, लेकिन ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन की स्थायी व्यवस्था कई गांवों में आज भी कागजों तक सीमित है। ग्रामीण इलाकों का गंदा पानी भी अंततः गंगा में ही पहुंच रहा है।
पर्यावरण विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यह योजना परिणाम से अधिक प्रचार आधारित होती जा रही है। उद्घाटन और शिलान्यास तो हुए, लेकिन निगरानी, जवाबदेही और स्थानीय स्तर पर ठोस क्रियान्वयन कमजोर साबित हुआ। कई परियोजनाओं में लागत बढ़ी, समयसीमा बदली, लेकिन गंगा की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखा।
सरकार नमामि गंगे को आस्था, पर्यटन और रोजगार से जोड़कर देखती है, लेकिन जानकारों का मानना है कि जब तक सीवेज प्रबंधन, औद्योगिक प्रदूषण पर सख्ती और नगर निकायों की जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक गंगा को वास्तव में निर्मल बनाना संभव नहीं है। कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में नमामि गंगे परियोजना आंशिक सफलता और अधूरी उम्मीदों की कहानी बनती जा रही है। अब सवाल यह है कि क्या आने वाले वर्षों में यह योजना अपने वादों को पूरा कर पाएगी, या फिर गंगा की सफाई का सपना एक बार फिर अधूरा ही रह जाएगा।
लागत बढ़ी, समय बीता अब तक खूब खर्च और नतीजा शून्य
नमामि गंगे परियोजना को शुरू करते समय गंगा को निर्मल और अविरल बनाने का बड़ा लक्ष्य तय किया गया था। शुरुआती चरण में इस योजना के लिए लगभग ₹20,000 करोड़ का प्रावधान किया गया था। बाद के चरणों में दायरा बढ़ने के साथ यह राशि बढ़ती चली गई।
सरकारी दस्तावेजों और संसद में दिए गए जवाबों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में नमामि गंगे के तहत ₹30,000 करोड़ से अधिक की परियोजनाएं स्वीकृत की जा चुकी हैं। इनमें से अब तक ₹18,000 से ₹20,000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुके हैं।
इसके बावजूद गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का लक्ष्य अब तक पूरा नहीं हो सका है। प्रदेश में 160 से अधिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) स्वीकृत किए गए, लेकिन कई परियोजनाएं वर्षों की देरी से पूरी हुईं या अब भी अधूरी हैं। लागत बढ़ी, समयसीमा बदली, लेकिन परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं आए।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह योजना अब लागत वृद्धि और देरी का उदाहरण बनती जा रही है।जहां एक ओर हजारों करोड़ खर्च हो चुके हैं,वहीं दूसरी ओर आज भी प्रतिदिन हजारों एमएलडी सीवेज बिना शोधन के गंगा में गिर रहा है।
पर्यावरणविदों का सवाल साफ है
जब परियोजना की कुल लागत लगातार बढ़ रही है और अब तक बीस हजार करोड़ से अधिक खर्च हो चुके हैं, तो फिर जमीनी बदलाव क्यों नहीं दिख रहा?
यही वजह है कि नमामि गंगे परियोजना उत्तर प्रदेश में अब केवल सफाई अभियान नहीं, बल्कि खर्च बनाम परिणाम और जवाबदेही बनाम लापरवाही की बहस का केंद्र बन चुकी है।


