यूथ इंडिया
दुनिया (world) के विकसित देश भविष्य की ठोस तैयारी कर रहे हैं। कहीं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (artifical Intelligence) के लिए कानून बनाए जा रहे हैं, कहीं युवाओं के लिए चार दिन का वर्क-वीक लागू हो रहा है, तो कहीं न्यूनतम आय की गारंटी देकर युवाओं को मानसिक सुरक्षा दी जा रही है। शिक्षा, रोजगार, मानसिक स्वास्थ्य और तकनीक—हर मोर्चे पर योजनाबद्ध निवेश हो रहा है। लेकिन भारत की तस्वीर इससे अलग है।
यहां भविष्य बनाने की जिम्मेदारी सीधे युवाओं के कंधों पर डाल दी गई है—बिना संसाधन, बिना सुरक्षा और बिना स्पष्ट नीति के। भारत में लगभग 60 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है। यही युवा बेरोजगारी, महंगाई, प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक, अस्थायी नौकरियों और बढ़ते मानसिक दबाव से जूझ रहा है। सरकारें बार-बार “युवा शक्ति” की बात करती हैं, लेकिन सवाल यह है कि इस शक्ति को दिशा देने के लिए क्या ठोस व्यवस्था है?
दुनिया जहां युवाओं को सिस्टम सपोर्ट दे रही है, वहीं भारत में युवा खुद सिस्टम को ढो रहा है।
यहां नौकरी नहीं मिली तो कहा जाता है—संघर्ष करो।
पेपर लीक हो गया तो—धैर्य रखो।
मानसिक तनाव बढ़ा तो—निजी मामला मान लिया जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या किसी भी देश का भविष्य केवल उम्मीदों से बनता है या नीतियों, संसाधनों और जिम्मेदारी से?
अगर दुनिया भविष्य बना रही है और भारत केवल युवाओं से उम्मीद लगाए बैठा है, तो यह असंतुलन ज्यादा दिन नहीं चल सकता। युवाओं को सिर्फ भाषण नहीं, अवसर, सुरक्षा और सम्मान चाहिए।अब समय आ गया है कि भारत भी उम्मीद करने के साथ-साथ भविष्य बनाने की जिम्मेदारी खुद उठाए।


