शरद कटियार
उत्तर प्रदेश का फर्रुखाबाद ज़िला एक बार फिर चुनावी मौसम में विकास के वादों से गुलज़ार हो रहा है। 400 करोड़ की फोरलेन सड़क, संकीसा को पर्यटन स्थल का दर्जा, रेलवे ओवरब्रिज—ऐसे तमाम बड़े-बड़े ऐलान एक बार फिर जनता के सामने परोसे जा रहे हैं। पर सवाल यह है कि क्या विकास सिर्फ घोषणाओं में होता है, या उसके लिए ईमानदार प्रयास और ज़मीन पर दिखने वाला बदलाव भी ज़रूरी होता है?
बीते आठ वर्षों की तस्वीर फर्रुखाबाद के लिए निराशाजनक रही है। टूटी-फूटी सड़कों, बजबजाती नालियों, और बीच सड़क पर खड़े जानलेवा बिजली के खंभों ने साफ कर दिया है कि जिले में शासन-प्रशासन की प्राथमिकताएं कुछ और हैं, जनता की ज़रूरतें कुछ और।
शहर के मुख्य मार्गों पर जहां बिजली के पुराने तार किसी भी वक्त जानलेवा हादसे को न्योता दे सकते हैं, वहीं नगर की अंदरूनी गलियों में कीचड़ और गंदगी के बीच जीवन जीना मजबूरी बन चुका है। पांचाल घाट सुंदरीकरण योजना हो या श्रीरामनगरिया मेले को राजकीय दर्जा देने का वादा—सभी कागज़ों और बैठकों तक सिमट कर रह गए हैं।
इलेक्ट्रिक श्मशान घाट की मांग भी वर्षों से उठ रही है, परंतु आज तक कोई ठोस पहल नहीं हुई। ये वे बुनियादी ज़रूरतें हैं, जिन्हें पूरा करना किसी भी जनप्रतिनिधि की नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। पर अफसोस, यह ज़िम्मेदारी घोषणाओं और नारों की भीड़ में खो गई।
आज ज़रूरत है कि जनता विकास की परिभाषा को केवल नारों, शिलान्यास, और भाषणों से नहीं, बल्कि ज़मीनी बदलाव से जोड़े। क्या कोई सड़क वास्तव में बनी? क्या कोई योजना पूरी हुई? क्या किसी सुविधा से आमजन का जीवन आसान हुआ?
फर्रुखाबाद को अब लॉलीपॉप नहीं, ठोस विकास चाहिए। और यह तभी संभव है जब राजनेताओं की जवाबदेही तय की जाए, वादों की सूची के साथ उनके पूरे किए गए कामों का लेखाजोखा भी मांग जाए।
चुनाव लोकतंत्र का उत्सव होता है—पर वह उत्सव तभी सार्थक होगा जब जनता वादों और हकीकत के बीच का फर्क समझे और सिर्फ बातों से नहीं, काम से वोट दे।
अब समय है—वादों की राजनीति नहीं, परिणाम की राजनीति की।
फर्रुखाबाद के भविष्य का सवाल अब केवल घोषणाओं से नहीं सुलझेगा।
