शरद कटियार
जिस दौर में महात्मा ज्योतिबा फुले (Mahatma Jyotiba Phule) ने समाज में जड़ जमा चुकी छूत-अछूत और जातिगत शोषण के खिलाफ आंदोलन की मशाल जलाई, उसी दौर में सत्ता और व्यवस्था ने ध्यान भटकाने के लिए धार्मिक आडंबरों (ostentation) को हवा दी। फुले लड़ रहे थे उस जकड़े हुए समाज से, जो दलित-शोषित वर्ग को इंसान मानने से इंकार करता था। उन्होंने शिक्षा को हथियार बनाया, स्त्रियों को स्कूलों तक पहुंचाया और जातिगत ऊँच-नीच के खिलाफ मोर्चा खोला। यह वह काम था, जिसे व्यवस्था और उसके समर्थक सहन नहीं कर सकते थे।
इसीलिए धर्म के नाम पर एक नया तमाशा खड़ा किया गया। लोकमान्य तिलक द्वारा गणेश उत्सव की शुरुआत उसी दौर में एक सामूहिक धार्मिक आयोजन के रूप में की गई ताकि जनता का ध्यान सामाजिक क्रांति से हटाकर फिर से मूर्तियों और कर्मकांडों की तरफ मोड़ा जा सके। यह महज संयोग नहीं है कि जब एक दलित ने साहस करके स्थापित गणेश प्रतिमा को छू दिया, तो उसी क्षण से विसर्जन की परंपरा रची गई। असल में यह विसर्जन नहीं, बल्कि समाज सुधार की चेतना का विसर्जन था।
आज यह परंपरा भव्य आयोजनों, ऊँचे-ऊँचे पंडालों और दिखावे में बदल चुकी है। जबकि ज्योतिबा फुले का दिया संदेश अब भी उतना ही प्रासंगिक है—सत्य, समानता और शिक्षा ही समाज की असली मुक्ति का रास्ता है। पर अफसोस, व्यवस्था आज भी उसी तरह धर्म और उत्सवों के नाम पर जनता की ऊर्जा को भटकाने में लगी है।ज्योतिबा फुले ने कहा था कि यदि समाज को बचाना है, तो शिक्षा और जागरूकता का दीपक जलाना होगा।
लेकिन आज का दौर हमें फिर से उसी पुरानी चाल में फंसा रहा है—मूर्तियों और जुलूसों में उलझाकर असली लड़ाई से दूर कर दिया गया है। यही वह छल है, जिसे समझना होगा और यही वह सच है, जिसे स्वीकार करना होगा। अब सवाल यह है कि हम ज्योतिबा फुले की मशाल को थामते हैं या फिर एक बार फिर से उसी अंधकार में लौट जाते हैं, जहाँ से वे हमें निकालकर लाए थे।
शरद कटियार
ग्रुप एडिटर
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