अनुराग तिवारी
उन्नाव। नेशनल हाईवे पर बीते रात 27/28 मार्च देर रात चेकिंग के दौरान एआरटीओ प्रवर्तन प्रतिभा गौतम और ट्रक ड्राइवरों के बीच हुई तीखी नोकझोंक ने एक बार फिर सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मौके पर मौजूद ड्राइवरों के अनुसार, चेकिंग के नाम पर कार्रवाई के दौरान महिला अधिकारी ने न केवल ट्रक की चाबी जबरन निकाल ली, बल्कि एक ड्राइवर को थप्पड़ भी मार दिया। इस घटना के बाद माहौल गरमा गया और ड्राइवर ने विरोध करते हुए कहा— “मैडम, आप गलत कर रही हैं, हमारे 5 लाख फॉलोवर्स हैं।” यह पूरा घटनाक्रम सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बन गया है, जहां लोग इसे “सड़क पर सत्ता का दुरुपयोग” बता रहे हैं।
पुराने आरोपों ने बढ़ाई गंभीरता
चौंकाने वाली बात यह है कि 12 नवंबर 2025 को एटीएस द्वारा अवैध वसूली के मामले में जिन आरटीओ और एआरटीओ अधिकारियों पर मुकदमा दर्ज किया गया था, उनमें एआरटीओ प्रतिभा गौतम का नाम भी शामिल था।
ऐसे में सवाल उठता है कि जिन अधिकारियों पर पहले से भ्रष्टाचार के आरोप हैं, वे ही अगर सड़क पर कानून का पालन करवाने के नाम पर मनमानी करें, तो आम जनता और वाहन चालकों को न्याय कौन देगा?
“चेकिंग या वसूली?” बड़ा सवाल
हाईवे पर ट्रक चालकों का आरोप है कि कई बार चेकिंग के नाम पर अनावश्यक दबाव बनाकर वसूली की जाती है। क्या नियमों के पालन के नाम पर वसूली का खेल चल रहा है? क्या कार्रवाई की आड़ में डर और दबाव बनाया जाता है? ये सवाल अब सिर्फ उन्नाव तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के परिवहन तंत्र पर लागू होते हैं।
कैसे सुधरेगा सरकारी तंत्र?
अगर ऐसी घटनाओं पर समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो जनता का भरोसा पूरी तरह खत्म हो जाएगा। सुधार के लिए जरूरी कदम हाईवे चेकिंग में बॉडी कैमरा अनिवार्य किया जाए, हर कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग और पब्लिक ऑडिट हो, भ्रष्टाचार के आरोपित अधिकारियों को मैदानी ड्यूटी से हटाया जाए। ट्रक ड्राइवरों के लिए हेल्पलाइन और त्वरित शिकायत निवारण सिस्टम बने।
दोषी पाए जाने पर तत्काल निलंबन और कड़ी सजा
जब कानून के रखवाले ही कानून तोड़ने लगें, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? उन्नाव की यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के आईने की तरह है — जिसमें भ्रष्टाचार, दबंगई और जवाबदेही की कमी साफ दिखाई देती है।
पहले से भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी अधिकारी फिर विवादों में, वही जब यूथ इण्डिया के ज्वाइंट एडिटर ने घटना पर एआरटीओ प्रतिभा गौतम का पक्ष जानना चाहा, तो फोन कॉल का कोई जवाब नहीं मिला। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर जनता अपने सवाल किससे पूछे? और जवाबदेही तय कैसे होगी?


