महोबा: प्रदेश की राजनीति में उस वक्त हलचल तेज हो गई, जब एक कार्यक्रम के दौरान स्वतंत्र देव सिंह ने स्थानीय विधायक गुड्डू से कहा“चलो, कार्यक्रम छोड़कर गांव चलते हैं, जमीनी हालात चेक करते हैं।” जवाब में विधायक का कथित कथन—“सड़कें अच्छी नहीं”—अब सियासी बहस का केंद्र बन गया है।
राजनीतिक हलकों में इस संवाद को महज़ सहज बातचीत नहीं, बल्कि मंत्री के जरिये मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार पर अप्रत्यक्ष प्रहार के तौर पर देखा जा रहा है। विपक्ष इसे विकास कार्यों पर सवाल के रूप में पेश कर रहा है, जबकि सत्तापक्ष के भीतर भी इसे असहज संदेश माना जा रहा है।
‘गांव चलो’ बनाम ‘सड़कें ठीक नहीं’
मंत्री का गांव जाकर निरीक्षण का सुझाव जहां ग्राउंड रियलिटी देखने की मंशा दिखाता है, वहीं विधायक का जवाब क्षेत्र की सड़क, बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक तैयारियों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। सियासी विश्लेषकों का कहना है कि यदि सड़कें वाकई ठीक नहीं हैं, तो यह स्वीकारोक्ति स्थानीय प्रतिनिधित्व की विफलता भी दर्शाती है।
योगी मॉडल पर विपक्ष का हमला
घटना के बाद विपक्ष ने इसे हाथों-हाथ लिया। उनका आरोप है कि “ज़ीरो टॉलरेंस” और “डबल इंजन” के दावों के बीच ग्रामीण सड़कों की हकीकत सामने आ गई है। विपक्ष का कहना है कि मंत्री का प्रस्ताव और विधायक की प्रतिक्रिया दोनों मिलकर सरकार की विकास कथा में दरार दिखाते हैं।
बीजेपी सूत्रों के अनुसार, यह बयानबाजी आंतरिक समन्वय की कमी को उजागर करती है। पार्टी के वरिष्ठ नेता इसे अनावश्यक राजनीतिक व्याख्या बता रहे हैं और कह रहे हैं कि निरीक्षण का उद्देश्य सुधार है, न कि आरोप-प्रत्यारोप। वहीं, कुछ नेताओं का मानना है कि मंत्री के मंच से ऐसा संवाद सार्वजनिक होने से सरकार की छवि पर असर पड़ता है।
असल मुद्दा सड़कें और जवाबदेही
सियासत अपनी जगह, लेकिन घटना ने फिर से ग्रामीण सड़कों की गुणवत्ता, निरीक्षण और जवाबदेही को चर्चा में ला दिया है। सवाल यह है कि क्या अब फील्ड विज़िट तेज होंगी? क्या जिम्मेदार विभाग टाइमलाइन के साथ सुधार करेंगे? और क्या स्थानीय प्रतिनिधि ग्राउंड रिपोर्ट के साथ सामने आएंगे?
यह प्रकरण सिर्फ एक संवाद नहीं, बल्कि सत्ता, जवाबदेही और विकास के त्रिकोण में फंसी राजनीति की तस्वीर है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार इसे सुधार का अवसर बनाती है या यह मुद्दा राजनीतिक हथियार बनकर और तेज होता है।


