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Saturday, February 21, 2026

वह क्रांति, जिसका ऋण लोकतंत्र आज भी अपने लोगों पर है

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“संपूर्ण क्रांति केवल सरकार बदलने का नाम नहीं है; यह समाज बदलने का संकल्प है।” — लोकनायक जयप्रकाश नारायण

एच एन शर्मा

संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2009 से प्रत्येक 20 फरवरी को ‘विश्व सामाजिक न्याय दिवस’ (world social justice day) के रूप में मनाने की घोषणा की। किंतु भारत में सामाजिक न्याय का यह स्वर 1974 में ही लोकनायक जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति’ (revolution) के आह्वान के साथ गूंज उठा था। दुनिया के कई देशों में सामाजिक न्याय की चर्चा सेमिनार कक्षों और सरकारी फाइलों में जन्म लेती है, पर भारत में यह आंदोलन भूख-मार्चों, जेलों, छात्र आंदोलनों और जनता की नैतिक चेतना से उपजा था। लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं, बल्कि सम्मान, आवाज और रोटी भी है—यह संदेश उसी दौर में स्थापित हुआ।

जेपी की ‘लोकनीति’ और उसके बाद की समाजवादी राजनीति, विशेषकर चंद्रशेखर जैसे नेताओं के माध्यम से, उस असमान व्यवस्था को चुनौती देने की कोशिश थी, जो आज़ादी के बाद नौकरशाही और शक्तिशाली अभिजात वर्ग के बीच गहराने लगी थी। विश्व सामाजिक न्याय दिवस 2026 के बीत जाने के बाद यह प्रश्न फिर खड़ा होता है—क्या वह सामाजिक न्याय, जिसकी कल्पना उस क्रांति ने की थी, गांवों, मजदूरों, भूमिहीनों और बेरोजगार युवाओं तक पहुंच पाया? या वह सत्ता-परिवर्तन के दरवाज़े पर ही ठहर गया?

सामाजिक हुंकार

राजनीति में कभी-कभी ऐसे क्षण आते हैं जब वह केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं रहती, बल्कि नैतिक विद्रोह बन जाती है। बिहार में छात्र आंदोलन से उपजा ‘संपूर्ण क्रांति’ का स्वर ऐसा ही एक क्षण था। जेपी का आह्वान केवल भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और निरंकुशता के खिलाफ नहीं था; वह सत्ता और नागरिक के रिश्ते को पुनर्परिभाषित करने की पुकार थी। यह चेतावनी भी थी कि राजनीतिक स्वतंत्रता, यदि सामाजिक और आर्थिक न्याय से विहीन हो, तो लोकतंत्र खोखला और आत्माहीन हो जाता है।

यह आंदोलन सैद्धांतिक आयातित समाजवाद नहीं था, बल्कि भारतीय सामाजिक वास्तविकताओं—जाति, वर्ग, शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि और अवसरों की असमानता—में जड़ें जमाए हुए था।

चंद्रशेखर: संघर्ष की निरंतरता

जेपी के विचारों को सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ाने वालों में एक प्रमुख नाम था—चंद्रशेखर। ‘युवा तुर्क’ के नाम से विख्यात इस नेता ने आपातकाल के दौरान जेल का सामना किया और सत्ता से असहमति व्यक्त करने का साहस दिखाया। गरीबी से उठे और गांवों से गहरा जुड़ाव रखने वाले चंद्रशेखर ने बार-बार कहा कि शासन को ग्रामीण भारत से जुड़ा रहना चाहिए। उन्होंने चेताया कि यदि सत्ता आमजन से कट जाएगी तो उसकी वैधता समाप्त हो जाएगी।
उनकी ‘भारत यात्रा’ पदयात्राएं केवल राजनीतिक अभियान नहीं थीं, बल्कि गांवों की धूल में चलकर देश की पीड़ा समझने का प्रयास थीं। वे मानते थे कि दिल्ली को कानून लिखने से पहले गांव की धूल अपने हाथों में लेनी चाहिए।

‘संपूर्ण’ परिवर्तन का अर्थ

संपूर्ण क्रांति ने भारतीय राजनीति की संस्कृति को स्थायी रूप से बदल दिया। उसने यह भ्रम तोड़ा कि सत्ता सार्वजनिक चुनौती से परे है। नागरिकों ने पुनः खोजा कि लोकतांत्रिक भागीदारी केवल मतदान तक सीमित नहीं, बल्कि जन-सक्रियता और जवाबदेही की मांग भी उसका हिस्सा है। भ्रष्टाचार को सामाजिक अन्याय के रूप में देखा गया, क्योंकि संसाधनों की चोरी का अर्थ है गरीबों से स्कूल, सड़क, सिंचाई और स्वास्थ्य छीन लेना।

अधूरा प्रतिबिंब

जेपी ने चेताया था कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा खतरा केवल तानाशाही नहीं, बल्कि संस्थागत दूरी है। जब सरकारें जनता से कट जाती हैं, पार्टियां चुनावी मशीन बन जाती हैं और नागरिक निर्णय-प्रक्रिया से अलग महसूस करते हैं, तब भरोसा टूटने लगता है। वर्षों में सामाजिक न्याय का अर्थ एक परिवर्तनकारी राजनीतिक मिशन से सिमटकर प्रशासनिक ढांचे में बदल गया। डिजिटल क्रांति ने कल्याण योजनाओं की पहुंच बढ़ाई है, लेकिन सामाजिक न्याय केवल लाभ पहुंचाने की गति से नहीं मापा जाता—बल्कि इस बात से कि क्या नागरिक उन लाभों से आत्मनिर्भर बन पाए।

आज भी ग्रामीण पलायन, असुरक्षित कृषि आय, असंगठित श्रम और शिक्षा की गुणवत्ता की कमी यह संकेत देती है कि संरचनात्मक समानता का लक्ष्य अभी दूर है।

भविष्य की ‘क्रांति’

संपूर्ण क्रांति की सीख नॉस्टेल्जिया नहीं, बल्कि निर्देश है।
सामाजिक न्याय किसी एक मंत्रालय या योजना का विषय नहीं, बल्कि शासन का मूल सिद्धांत होना चाहिए।
यह मांग करता है—
सरकारी और निजी शिक्षा में समान गुणवत्ता
सम्मानजनक रोजगार सृजन
संस्थाओं तक हर नागरिक की सहज पहुंच
विकास के साथ संरचनात्मक असमानता में वास्तविक कमी
क्रांति किसी एक राजनीतिक चक्र में समाप्त होने के लिए नहीं थी। वह भारत की लोकतांत्रिक चेतना का स्थायी आह्वान थी।
प्रश्न आज भी वही है—
क्या हम उस पुकार को याद रखेंगे?
क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति उस अधूरे वादे को पूरा कर पाएगी?
लोकतंत्र का वास्तविक मापदंड आंकड़ों में नहीं, बल्कि उस सम्मान में है जो सबसे कमजोर नागरिक को मिलता है।
संपूर्ण क्रांति अभी समाप्त नहीं हुई—
वह आज भी अपने पूर्ण होने की प्रतीक्षा में
लेखक :देश के जाने माने स्वतंत्र विचारक हैँ।

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