– महिला सशक्तिकरण के दावे सवालों के घेरे में
नई दिल्ली: भारत जैसे देश में सोना और चांदी (gold and silver) केवल आभूषण नहीं, बल्कि महिला (women) सम्मान, सामाजिक सुरक्षा और पारिवारिक विश्वास से गहराई से जुड़े प्रतीक रहे हैं। विवाह से लेकर आपात स्थिति तक, स्त्री के लिए सोना–चांदी उसकी सबसे सुरक्षित पूंजी मानी जाती है। लेकिन मौजूदा दौर में इन्हीं धातुओं की कीमतों में हुई बेतहाशा बढ़ोतरी ने महिला सम्मान औरसशक्तिकरण की सरकारी घोषणाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
केंद्र और राज्य सरकारें एक ओर महिला सशक्तिकरण, महिला मिशन और सम्मान की बात कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर महिला सम्मान से जुड़े सोना–चांदी को आम महिला की पहुंच से बाहर किया जा चुका है। स्थिति यह है कि मध्यम वर्ग की बेटियों की शादी अब कर्ज का बोझ बनती जा रही है।
गरीब परिवारों के लिए सोना–चांदी सपना मात्र रह गया है,स्त्री की पारंपरिक सुरक्षा पूंजी अब सामाजिक असमानता को बढ़ा रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आयात नीति, कर व्यवस्था, वैश्विक बाजार पर निर्भरता और घरेलू नियंत्रण की कमी ने इस महंगाई को और बढ़ाया है। सवाल यह है कि क्या नीतियां बनाते समय महिला और सामाजिक प्रभावों को गंभीरता से परखा गया?
जिस समाज में महिला सम्मान को सोना–चांदी से जोड़कर देखा जाता रहा हो, वहां इन्हीं वस्तुओं को सैकड़ों गुना महंगा कर देना क्या महिला सशक्तिकरण है? या फिर यह दर्शाता है कि महिला सम्मान की कीमत लगातार गिरती जा रही है, और वह केवल नारेबाजी तक सीमित रह गया है। सोना–चांदी की बढ़ती कीमतें केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि महिला सम्मान और सामाजिक न्याय का प्रश्न हैं। जब तक नीतिगत स्तर पर संतुलन और संवेदनशीलता नहीं आएगी, तब तक महिला सशक्तिकरण के दावे जमीनी हकीकत से दूर ही रहेंगे।


