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Friday, January 23, 2026

सड़क पर सड़ रहा ‘सब्ज़ी का राजा’, कोल्ड स्टोरेज के बाहर फेंका जा रहा आलू, बदबू और महामारी का खतरा

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फर्रुखाबाद: जिस आलू को कभी सब्ज़ियों का राजा (King of Vegetables) कहा जाता था, वही आज फर्रुखाबाद की सड़कों और कोल्ड स्टोरेज के बाहर सड़ता नजर आ रहा है। आलू (potatoes) की दुर्दशा इस कदर है कि जगह-जगह फेंके गए सड़े आलू से तेज़ बदबू फैल रही है और महामारी फैलने की आशंका भी गहराती जा रही है। इसके बावजूद जिम्मेदार विभाग और प्रशासन आंख मूंदे बैठे हैं।

जनपद में आलू उत्पादक किसान पहले ही बरसात की मार से टूट चुके हैं, ऊपर से बाजार में आलू के दाम लागत से भी नीचे चले गए हैं। नतीजा यह है कि किसान को उसका आलू बेमोल बिक रहा है। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि किसान कोल्ड स्टोरेज से आलू निकालने की बजाय उसे सड़ने के लिए मजबूर हो रहा है।

हर साल दोहराई जा रही वही कहानी

हर वर्ष हजारों टन आलू या तो कोल्ड स्टोरेज में सड़ जाता है या फिर बाहर फेंक दिया जाता है। सड़ा आलू खुले में फेंकना न केवल सरकारी नियमों का खुला उल्लंघन है, बल्कि यह जनस्वास्थ्य के लिए भी बड़ा खतरा बन चुका है। इसके बावजूद न तो जिला आलू अधिकारी कार्रवाई कर रहे हैं और न ही संबंधित विभाग कोई ठोस कदम उठा रहे हैं।

किसानों की मांगों पर क्यों नहीं हो रही सुनवाई?

किसानों का साफ कहना है कि यदि सरकार समय रहते उनकी मांगों और समस्याओं पर ध्यान दे, तो यह हालात पैदा ही न हों। उचित समर्थन मूल्य, भंडारण नीति और विपणन व्यवस्था की कमी ने किसान को पूरी तरह तोड़ दिया है।

कोल्ड स्टोरेज में फंसा आलू, किसान बेबस

आलू विपणन संघ के निर्देशक अशोक कटियार एडवोकेट के अनुसार जनपद में कुल 109 कोल्ड स्टोरेज हैं, जिनमें लगभग 7.14 लाख मीट्रिक टन आलू भंडारित किया गया था। वर्तमान में भी करीब 50 हजार मीट्रिक टन आलू कोल्ड स्टोरेज में पड़ा हुआ है। बाजार में दाम लगातार गिरने के कारण किसान आलू निकालने की हिम्मत नहीं कर पा रहा, क्योंकि लागत तक नहीं निकल रही।

उन्होंने कहा कि इसी मजबूरी में कई कोल्ड स्टोरेज संचालक सड़ा आलू बाहर फेंकने पर मजबूर हैं, जिससे हालात और भयावह हो रहे हैं।

अधिक उत्पादन = अधिक नुकसान ?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि देश कृषि प्रधान है, तो किसान का अधिक उत्पादन उसके लिए नुकसान क्यों बन रहा है?
सरकार और कृषि विभाग की नीतियां आखिर किसके लिए हैं?
जब तक किसानों की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक ‘सब्ज़ी का राजा’ इसी तरह सड़कों पर सड़ता रहेगा और किसान कर्ज़ व नुकसान के दलदल में धंसता जाएगा।

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