रविवार 1 फरवरी को पेश होने वाले केंद्रीय बजट पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं। इस बार का बजट कई मायनों में खास माना जा रहा है, क्योंकि हाल ही में लागू हुए जीएसटी 2.0 के बाद अब तक फिल्म और मनोरंजन उद्योग पूरी तरह संभल नहीं पाया है। लगातार फ्लॉप होती फिल्में, खाली होते थिएटर और बढ़ती लागत ने इंडस्ट्री की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
भारत की फिल्म इंडस्ट्री, जो करोड़ों लोगों को रोजगार देती है और देश की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है, इस बार बजट से खास उम्मीद लगाए बैठी है। टैक्स का बढ़ता बोझ, थिएटरों का बंद होना, मजदूरों की सुरक्षा और स्वतंत्र फिल्मों का भविष्य जैसे मुद्दे आज सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं।
ऐसे माहौल में अमर उजाला से बातचीत में फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कई दिग्गजों ने सरकार से खुलकर अपनी बात रखी। सभी की समस्याएं अलग थीं, लेकिन संदेश एक ही था—अब केवल आश्वासन नहीं, ठोस फैसलों की जरूरत है।
फिल्म प्रोड्यूसर तनुज गर्ग का कहना है कि भारत में फिल्म बनाना पहले से कहीं ज्यादा महंगा हो गया है। जीएसटी और कमजोर राज्य रियायतों के कारण निर्माता भारत में शूटिंग से डरने लगे हैं और विदेशों का रुख कर रहे हैं। उन्होंने साफ कहा कि सरकार को सिनेमा को विलासिता नहीं, बल्कि जरूरत के रूप में देखना चाहिए।
वहीं, निधि परमार ने मिड-बजट फिल्मों की दुर्दशा पर चिंता जताई। उनका कहना है कि फिल्म शुरू होते ही आधा बजट जीएसटी और तकनीकी खर्चों में खत्म हो जाता है। थिएटर टिकट और खाने-पीने की महंगाई ने दर्शकों को दूर कर दिया है। अगर सरकार दर्शकों की जेब पर बोझ कम करे, तो थिएटर फिर से गुलजार हो सकते हैं।
थिएटर ओनर विषेक चौहान ने केंद्र और राज्य सरकारों की टैक्स नीति पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकारें फिल्में टैक्स फ्री करती हैं, लेकिन केंद्र का जीएसटी फिर भी देना पड़ता है। भारत में सिर्फ 9,000 के आसपास स्क्रीन हैं, जो सिनेमा संस्कृति के लिए खतरे की घंटी है।
एफडब्ल्यूआईसीई अध्यक्ष बीएन तिवारी ने फिल्मों की चमक के पीछे छिपे मजदूरों के दर्द को सामने रखा। उन्होंने कहा कि सेट पर काम करने वाले मजदूरों को समय पर भुगतान, सीमित काम के घंटे, बीमा और मेडिकल सुविधा आज भी नसीब नहीं है। अगर मजदूर टूटेंगे, तो पूरी इंडस्ट्री कमजोर हो जाएगी।
अक्षय राठी का मानना है कि बजट में सिनेमा की हमेशा अनदेखी होती है। जबकि सरकार सिनेमा को भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ कहती है, नीतियों में उसका असर नहीं दिखता। उन्होंने स्क्रीन बढ़ाने और तकनीकी उपकरणों पर टैक्स घटाने की मांग की।
स्वतंत्र फिल्मों के भविष्य को लेकर संजय गुलाटी ने गंभीर चिंता जताई। उनका कहना है कि भारत में इंडी फिल्म बनाना बेहद कठिन हो गया है। अगर शुरुआत से ही सरकारी आर्थिक मदद नहीं मिली, तो ईमानदार और मजबूत कहानियां धीरे-धीरे गायब हो जाएंगी।
प्रोड्यूसर शब्बीर बॉक्सवाला ने साफ शब्दों में कहा कि फिल्म इंडस्ट्री देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देती है, लेकिन बजट में उसे कभी प्राथमिकता नहीं मिलती। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इस बार भी राहत नहीं मिली, तो कई लोग यह पेशा छोड़ने को मजबूर हो जाएंगे।
अब सबकी नजरें 1 फरवरी के बजट पर टिकी हैं। सवाल सिर्फ यही है—क्या इस बार सरकार फिल्म इंडस्ट्री की आवाज सुनेगी, या फिर यह क्षेत्र एक बार फिर उम्मीद और निराशा के बीच झूलता रह जाएगा।


