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Tuesday, February 10, 2026

आत्मा की अनंत यात्रा और भारतीय चिंतन की दृष्टि

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“हम एक शरीर नहीं हैं जो आत्मा को धारण किए हुए हैं; हम एक आत्मा हैं जो शरीर के अनुभव से गुजर रहे हैं।” — डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

प्रस्तुति- भरत चतुर्वेदी

भारतीय दर्शन की यह पंक्ति मात्र एक विचार नहीं, बल्कि जीवन को देखने की सम्पूर्ण दृष्टि है। पश्चिमी चिंतन (western thinking) जहां अक्सर शरीर को केंद्र में रखकर जीवन की व्याख्या करता है, वहीं भारतीय आध्यात्मिक परंपरा आत्मा (Soul) को मूल सत्य मानती है और शरीर को उसका अस्थायी साधन। भारतीय चिंतन के अनुसार शरीर आत्मा का घर नहीं, बल्कि आत्मा का अनुभव-क्षेत्र है। आत्मा न जन्म लेती है और न मरती है; जन्म और मृत्यु केवल शरीर के होते हैं। आत्मा अपनी अनवरत और अंतहीन यात्रा में, अपने कर्म और प्रवृत्ति (गुण एवं संस्कार) के अनुसार विभिन्न योनियों में भिन्न-भिन्न शरीर धारण करती है।

यही कारण है कि भारतीय दर्शन में कहा गया है—
“जैसा कर्म, वैसा जीवन।” मनुष्य का वर्तमान जीवन उसके पूर्व कर्मों का परिणाम है और वर्तमान कर्म उसके भविष्य का निर्माण करते हैं। आत्मा की इस निरंतर यात्रा में कर्म ही उसका पथ-प्रदर्शक है। अच्छे कर्म आत्मा को उन्नति की ओर ले जाते हैं, जबकि दुष्कर्म उसे बंधन में डालते हैं। भारतीय दर्शन में मोक्ष की अवधारणा भी कर्म से ही जुड़ी है—जब आत्मा कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाती है, तभी उसकी यात्रा पूर्ण होती है।

इस दृष्टि से जीवन केवल भोग का माध्यम नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व और साधना है। हर विचार, हर शब्द और हर कर्म आत्मा पर संस्कार छोड़ता है। भारतीय आध्यात्मिक चिंतन का शिखर माने जाने वाले उपनिषद यह स्पष्ट करते हैं कि आत्मा न पुरुष है, न स्त्री और न ही नपुंसक।आत्मा जिस शरीर को धारण करती है, उसी के अनुरूप उसका सामाजिक और व्यवहारिक आचरण दिखाई देता है, लेकिन आत्मा स्वयं इन सीमाओं से परे रहती है।

यह विचार भारतीय दर्शन को समता और करुणा की ओर ले जाता है। जब आत्मा ही सत्य है और वह लिंग, जाति या वर्ग से परे है, तो भेदभाव का कोई आध्यात्मिक आधार नहीं बचता। शब्द, आत्मा और सर्वकल्याण भारतीय चिंतन में शब्द (वाणी), आत्मा और सर्वकल्याण प्रेरक मानवीय मूल्य अमर और अविनाशी माने गए हैं। शब्द इसलिए, क्योंकि वह विचार को आकार देता है। आत्मा इसलिए, क्योंकि वह जीवन का मूल तत्व है।

और सर्वकल्याण इसलिए, क्योंकि व्यक्ति का उद्देश्य केवल स्वयं का नहीं, बल्कि समष्टि का कल्याण होना चाहिए। यही कारण है कि भारतीय दर्शन में “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना विकसित हुई—पूरी पृथ्वी को एक परिवार मानने की सोच। आज के भौतिकवादी और प्रतिस्पर्धात्मक युग में, जहां मनुष्य स्वयं को केवल शरीर, पद और संपत्ति तक सीमित कर रहा है, भारतीय आध्यात्मिक चिंतन आंतरिक संतुलन और नैतिक दिशा प्रदान करता है।

यदि मनुष्य यह समझ ले कि वह एक आत्मा है जो अनुभव कर रही है, न कि केवल एक शरीर जो भोग कर रहा है—तो जीवन में संयम, करुणा और जिम्मेदारी स्वतः आ जाएगी।

भारतीय दर्शन का संदेश स्पष्ट है— जीवन की सार्थकता शरीर की सुविधा में नहीं, बल्कि आत्मा की उन्नति में है।अच्छे कर्म ही अच्छे जीवन का निर्धारक हैं और आत्मा की यह यात्रा तभी सुंदर बनती है, जब मनुष्य अपने विचार, शब्द और कर्म—तीनों को शुद्ध रखे।आत्मा अमर है, कर्म उसका पथ हैं और सर्वकल्याण उसका लक्ष्य—यही भारतीय चिंतन का शाश्वत सत्य है।

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