शरद कटियार
संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी (Rahul Gandhi) का यह कथन कि “देश के पिछड़े लोग अभिमन्यु नहीं, अर्जुन हैं” (Arjun, not Abhimanyu) कोई भावनात्मक भाषण मात्र नहीं था, बल्कि यह भविष्य की राजनीति का साफ रोडमैप था। यह बयान सीधे तौर पर सत्ता संरचना, सामाजिक प्रतिनिधित्व और नीति-निर्माण की दिशा पर सवाल खड़ा करता है।
सत्ता बनाम संख्या की राजनीति
राहुल गांधी की राजनीति अब साफ तौर पर संख्या बनाम सत्ता के टकराव पर केंद्रित दिख रही है। उनका तर्क है कि देश की सामाजिक संरचना में ओबीसी लगभग 55%,एससी करीब 16.6%,एसटी लगभग 8.6% हैं, यानि कुल मिलाकर करीब 80% आबादी इन्हीं वर्गों से आती है। इसके बावजूद निर्णय लेने वाली जगहों,नौकरशाही, कॉरपोरेट सेक्टर, नीति आयोग,विश्वविद्यालयों और न्यायिक तंत्र—में इनकी भागीदारी नगण्य है। राजनीतिक भाषा में यह सीधा आरोप है कि लोकतंत्र की सत्ता कुछ चुनिंदा वर्गों तक सीमित है।
अभिमन्यु का रूपक यह दर्शाने के लिए इस्तेमाल किया गया कि पिछड़े वर्गों को व्यवस्था के अंदर तो आने दिया गया, लेकिन सिस्टम को समझने और नियंत्रित करने का रास्ता जानबूझकर बंद रखा गया। वहीं अर्जुन का रूपक यह संदेश देता है कि अगर जानकारी, संसाधन और अवसर बराबर मिलें, तो यही वर्ग सत्ता का केंद्र बन सकता है।
यह तुलना राजनीतिक रूप से इसलिए अहम है क्योंकि यह कमजोरी के नैरेटिव को तोड़ती है और पिछड़े वर्गों को निर्णायक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है। राहुल गांधी की पूरी रणनीति जातिगत जनगणना के इर्द-गिर्द घूमती है। यह मांग केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि सत्ता के पुनर्वितरण की मांग है। नीतियों की समीक्षा का आधार बनेगी,आरक्षण और संसाधनों के बंटवारे पर नई बहस खोलेगी,और मौजूदा सामाजिक संतुलन को चुनौती देगी।इसी कारण सत्ता पक्ष इस मुद्दे से बचता दिखता है, जबकि विपक्ष इसे अपना सबसे मजबूत हथियार मान रहा है।
सदन में हुआ हंगामा केवल शोर-शराबा नहीं था, बल्कि यह संकेत था कि यह बहस सरकार को असहज कर रही है। जब सवाल सीधे प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी पर आता है, तो वह केवल विपक्षी हमला नहीं रहता, बल्कि सत्ता की वैधता पर सवाल बन जाता है।
चुनावी राजनीति का संकेत
यह बयान आने वाले चुनावों के लिए साफ संदेश देता है, कांग्रेस सामाजिक न्याय को डेटा आधारित राजनीति के रूप में पेश करेगी।पिछड़े, दलित और आदिवासी वर्गों को केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि सत्ता के साझेदार के रूप में पेश किया जाएगा।यह राजनीति भावनाओं से ज्यादा आंकड़ों और प्रतिनिधित्व पर टिकेगी।
“अभिमन्यु नहीं, अर्जुन” का नारा असल में सत्ता संरचना बदलने की घोषणा है। राहुल गांधी यह संकेत दे रहे हैं कि आने वाले समय में राजनीति केवल विकास बनाम विरोध की नहीं होगी, बल्कि प्रतिनिधित्व बनाम वर्चस्व की होगी। अब सवाल यह नहीं है कि बयान दिया गया, सवाल यह है कि क्या सरकार इस चुनौती का ठोस जवाब दे पाएगी,या यह बहस भारतीय राजनीति को एक नए सामाजिक मोड़ पर ले जाएगी।


