– सेना ने रिजेक्ट किया, अब बाजार में तो नहीं पहुंचेगा ये माल?
– FSSAI की कार्रवाई पर सवाल
– खराब दूध नष्ट होगा या फिर जनता की थाली में जाएगा?
– जिम्मेदारों की चुप्पी = जनता की सेहत से खिलवाड़?
अनुराग तिवारी
चंडीगढ़ : देश की सुरक्षा में तैनात भारतीय सेना के लिए भेजे गए दूध पाउडर को लेकर सामने आया मामला अब केवल एक सप्लाई फेलियर नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर चेतावनी बनता जा रहा है। पंजाब की प्रतिष्ठित डेयरी ब्रांड वेरका (मिल्कफ़ेद ) द्वारा सप्लाई किए गए करीब 125 मीट्रिक टन दूध पाउडर को सेना ने गुणवत्ता मानकों पर खरा न उतरने के कारण खारिज कर दिया, जिससे पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
जानकारी के अनुसार, यह सप्लाई दो खेपों—58.338 मीट्रिक टन और 66.654 मीट्रिक टन—में भेजी गई थी। सेना की खाद्य जांच एजेंसी द्वारा परीक्षण के दौरान इसमें बाहरी अशुद्ध पदार्थ पाए गए, जिसमें धागे जैसे कण भी शामिल थे। हैरानी की बात यह है कि सैंपल को दो बार जांचा गया और दोनों बार वह फेल हो गया, इसके बावजूद यह खेप सप्लाई चेन में पहुंच गई।
इस गंभीर लापरवाही को देखते हुए विभाग ने सख्त कार्रवाई करते हुए तीन वरिष्ठ अधिकारियों—जनरल मैनेजर, क्वालिटी मैनेजर और प्रोडक्शन मैनेजर—को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। मामले को “मेजर मिसकंडक्ट” की श्रेणी में रखते हुए विभागीय जांच शुरू कर दी गई है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल निलंबन ही पर्याप्त है?
अब सबसे बड़ा मुद्दा यह बनता है कि इस 125 मीट्रिक टन खारिज दूध पाउडर का आगे क्या होगा? देश में खाद्य सुरक्षा की जिम्मेदारी खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (फस्साई ) और राज्य खाद्य विभागों की होती है।
नियमों के अनुसार यदि कोई खाद्य पदार्थ असुरक्षित या मानकों से नीचे पाया जाता है, तो उसे तुरंत जब्त कर बाजार से हटाया जाता है, संबंधित बैच को ट्रैक किया जाता है और अंत में उसे वैज्ञानिक तरीके से नष्ट किया जाता है, ताकि वह दोबारा उपभोग में न आ सके। लेकिन इस मामले में अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि: क्या पूरे स्टॉक को जब्त किया गया है? क्या इसे नष्ट करने की प्रक्रिया शुरू हुई है? या फिर यह खराब दूध पाउडर किसी अन्य चैनल के जरिए बाजार में पहुंच सकता है?
यही वह बिंदु है जहां यह मामला बेहद गंभीर हो जाता है। यदि इस स्तर का उत्पाद, जिसे सेना ने खारिज कर दिया, बाजार में पहुंचता है तो यह सीधे तौर पर आम जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ होगा। विपक्ष ने इस पूरे मामले को सरकार की लापरवाही बताते हुए सवाल उठाया है कि जब सेना को भेजा गया दूध ही मानकों पर खरा नहीं उतर रहा, तो आम जनता को मिलने वाले उत्पादों की गुणवत्ता पर भरोसा कैसे किया जाए? विशेषज्ञों का भी मानना है कि यह घटना केवल एक ब्रांड की नहीं, बल्कि पूरे गुणवत्ता नियंत्रण सिस्टम की कमजोरी को उजागर करती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—
जब गुणवत्ता खराब है और जिम्मेदार कार्रवाई नहीं करते, तो क्या लोगों को दूध के नाम पर जहर परोसा जाएगा? सेना द्वारा दूध पाउडर की खेप खारिज किया जाना एक चेतावनी है। सेना ने अपनी जिम्मेदारी निभाई, लेकिन अब जिम्मेदारी नागरिक प्रशासन और खाद्य सुरक्षा एजेंसियों की है कि वे इस खराब स्टॉक को पूरी तरह नष्ट करें और यह सुनिश्चित करें कि ऐसा कोई भी उत्पाद बाजार तक न पहुंचे। यदि ऐसा नहीं होता, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि जनता के स्वास्थ्य के साथ एक गंभीर अपराध माना जाएगा।


