अमृतपुर (फर्रुखाबाद): जनपद में कानून-व्यवस्था (Law and order) को लेकर पुलिस अधीक्षक और क्षेत्राधिकारी द्वारा लगातार सख्त निर्देश दिए जा रहे हैं, लेकिन थाना अमृतपुर (Amritpur police station) में तैनात थानाध्यक्ष की कार्यशैली इन निर्देशों के ठीक उलट दिखाई दे रही है। क्षेत्रवासियों का आरोप है कि यहां कानून की किताब नहीं, बल्कि थानाध्यक्ष की निजी सोच और व्याख्या ही न्याय का पैमाना बन गई है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि संज्ञेय अपराध में तहरीर मिलते ही मुकदमा दर्ज करना अनिवार्य होने के बावजूद पीड़ित फरियादियों को महीनों तक थाने के चक्कर क्यों काटने पड़ते हैं? तहरीर लेने के बाद भी “जांच चल रही है” कहकर मुकदमा दर्ज क्यों नहीं किया जाता? और कई मामलों में बिना किसी प्राथमिक जांच के दोनों पक्षों पर क्रॉस मुकदमे दर्ज कर असली पीड़ित को ही आरोपी की कतार में क्यों खड़ा कर दिया जाता है?
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब पॉक्सो एक्ट और बलात्कार जैसे संवेदनशील मामलों में भी यही दोहरा रवैया देखने को मिलता है। कहीं पीड़िता न्याय की आस में दर-दर भटकती रहती है, तो कहीं प्रभावशाली पक्ष को तरजीह देकर पूरे मामले की दिशा ही बदल दी जाती है। यह न केवल कानून की मूल भावना के खिलाफ है, बल्कि पुलिस अधीक्षक और क्षेत्राधिकारी की कार्यशैली पर भी अप्रत्यक्ष रूप से सवाल खड़े करता है।
क्षेत्रवासियों का कहना है कि थाना अमृतपुर में अब तहरीर लेना, मुकदमा दर्ज करना या रोकना नियमों से नहीं, बल्कि थानाध्यक्ष की मर्जी से तय हो रहा है। इस स्थिति के चलते आम जनता का पुलिस पर भरोसा तेजी से टूटता जा रहा है, जो कानून-व्यवस्था के लिए बेहद चिंताजनक संकेत है। अब बड़ा सवाल यह है कि पुलिस अधीक्षक और क्षेत्राधिकारी इस कथित मनमानी पर कब संज्ञान लेंगे? और क्या पीड़ितों को समयबद्ध और निष्पक्ष न्याय दिलाने के लिए कोई ठोस कार्रवाई की जाएगी, या फिर थाना अमृतपुर में न्याय यूं ही व्यक्तिगत फैसलों के हवाले बना रहेगा?


