प्रशांत कटियार
उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश के निर्यात उद्योग आज अमेरिकी टैरिफ की मार से जूझ रहे हैं। प्रदेश से हर साल 1.86 लाख करोड़ रुपये का निर्यात होता है, जिसमें अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 36 हजार करोड़ रुपये की है। इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों को छोड़ दें, तो लेदर, कालीन, पीतल, कांच, टेक्सटाइल और साड़ी जैसे पारंपरिक उद्योग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। इन उद्योगों पर मंडराता संकट सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि लाखों कारीगरों और श्रमिकों के जीवनयापन से सीधे जुड़ा हुआ है।
सबसे गंभीर हालात लेदर और फुटवियर उद्योग के हैं। पिछले साल 16 हजार करोड़ का निर्यात हुआ, जिसमें अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग 5 हजार करोड़ रुपये रही। अब 45% तक की गिरावट की आशंका जताई जा रही है। कालीन और दरी उद्योग का भी यही हाल है17 हजार करोड़ रुपये के निर्यात में अमेरिका का हिस्सा 7 हजार करोड़ का रहा और अब इसमें 50% तक की कमी होने की संभावना है। बनारस की साड़ी, भदोही का कालीन, मुरादाबाद का पीतल और फ़िरोज़ाबाद का कांच ये न केवल वैश्विक बाजार में यूपी की पहचान हैं, बल्कि हजारों-लाखों परिवारों की रोज़ी-रोटी भी इनसे जुड़ी है। पर असली चिंता यह है कि देश-प्रदेश की जनता के साथ तब खिलवाड़ और बढ़ जाता है जब अखबार और टीवी चैनल इस मसले को गंभीरता से नहीं उठाते। मीडिया अक्सर यह दिखाने में व्यस्त रहता है कि अमेरिका को कितना नुकसान होगा, लेकिन भारत विशेषकर यूपी के निर्यात उद्योगों और कारीगरों पर पड़ने वाले प्रभाव को बहुत कम जगह देता है। यह दृष्टिकोण न सिर्फ पक्षपातपूर्ण है, बल्कि आम जनता को वास्तविक संकट से अनजान रखने का भी काम करता है। मीडिया की यही चुप्पी उन छोटे उद्योगों के दर्द को और गहरा कर देती है, जिनका अस्तित्व ही दांव पर लगा हुआ है। अब ज़रूरत है कि केंद्र सरकार कूटनीतिक स्तर पर अमेरिका से वार्ता कर इस संकट का समाधान निकाले। प्रदेश सरकार को भी आगे बढ़कर छोटे निर्यातकों और कारीगरों के लिए राहत पैकेज और नए बाज़ार तलाशने की रणनीति बनानी चाहिए। खाड़ी, यूरोप और एशियाई देशों में वैकल्पिक बाजार खोजे बिना इस संकट से उबरना कठिन होगा।यह टैरिफ संकट केवल आंकड़ों की गिरावट नहीं है, बल्कि यह यूपी की पहचान, परंपरा और लाखों कारीगरों के भविष्य पर सीधा हमला है। सरकार को त्वरित कार्रवाई करनी होगी और मीडिया को भी अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए जनता के सामने सच रखना होगा। क्योंकि अगर मीडिया ही आंख मूंद ले, तो आम आवाम तक वास्तविक संकट की तस्वीर कभी नहीं पहुंचेगी।