(खाड़ी में तनाव)
अनुराग तिवारी
नई दिल्ली : दुनिया में बढ़ते युद्ध और खाड़ी क्षेत्र में गहराते तनाव का असर अब सीधे भारत के खेतों तक पहुंचने की आशंका है। वैश्विक स्तर पर उर्वरक (फर्टिलाइजर) सप्लाई पर मंडराता संकट भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए गंभीर चिंता बनता जा रहा है। आने वाले बुआई सीजन से पहले खाद की उपलब्धता और कीमतों को लेकर स्थिति चुनौतीपूर्ण होती दिख रही है, जिससे खाद्यान्न उत्पादन और आम जनता की थाली दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
दरअसल, भारत, ब्राज़ील और चीन जैसे बड़े कृषि देश खाड़ी क्षेत्र से आने वाले उर्वरकों पर काफी हद तक निर्भर हैं। आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में इस्तेमाल होने वाले लगभग 35 प्रतिशत यूरिया, 53 प्रतिशत सल्फर और 64 प्रतिशत अमोनिया की सप्लाई इसी क्षेत्र से जुड़ी हुई है। ऐसे में यदि युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव के कारण समुद्री मार्ग बाधित होते हैं, तो उर्वरकों की सप्लाई चेन पर सीधा असर पड़ सकता है।
भारत की स्थिति इस मामले में और भी संवेदनशील है। देश अपनी जरूरत का 40 प्रतिशत से अधिक यूरिया और फॉस्फेट आधारित उर्वरक आयात करता है, जिसमें खाड़ी देशों की हिस्सेदारी प्रमुख है। यदि यहां से सप्लाई प्रभावित होती है, तो किसानों को समय पर खाद मिलना मुश्किल हो जाएगा, जिससे बुआई प्रभावित हो सकती है और फसल उत्पादन में गिरावट आ सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संकट लंबा खिंचता है, तो उर्वरकों की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल सकता है। फॉस्फेट और अन्य खादों की कीमतों में करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है। इससे खेती की लागत बढ़ेगी और अंततः इसका असर बाजार में अनाज, दाल और सब्जियों की कीमतों पर पड़ेगा। यानी महंगाई की मार आम आदमी तक पहुंचना तय है। सबसे बड़ी चिंता आने वाले बुआई सीजन को लेकर है। यदि समय पर खाद उपलब्ध नहीं हुई, तो बीज बोने की प्रक्रिया प्रभावित होगी, जिससे उत्पादन घटेगा। इसका असर सबसे ज्यादा छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ेगा, जो पहले से ही लागत और संसाधनों के दबाव में हैं। यदि हालात नहीं सुधरे, तो देश को खाद्यान्न संकट जैसी स्थिति का भी सामना करना पड़ सकता है। उत्पादन में गिरावट, आयात पर बढ़ती निर्भरता और बढ़ती महंगाई एक साथ मिलकर आर्थिक और सामाजिक चुनौती खड़ी कर सकती है। हालांकि, इस संकट से निपटने के लिए सरकार के पास विकल्प मौजूद हैं। घरेलू उर्वरक उत्पादन बढ़ाना, वैकल्पिक सप्लाई चेन तैयार करना, किसानों को सब्सिडी के माध्यम से राहत देना और जैविक खेती को बढ़ावा देना ऐसे कदम हैं जो स्थिति को संभाल सकते हैं। लेकिन इसके लिए त्वरित और ठोस रणनीति की आवश्यकता होगी। कुल मिलाकर, खाड़ी क्षेत्र का यह तनाव केवल एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत के खेत, किसान और आम जनता की थाली से जुड़ा हुआ संकट बन चुका है। आने वाले समय में यह स्थिति किस दिशा में जाती है, इस पर देश की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता दोनों निर्भर करेंगी।
किसान नेता से बातचीत:
भारतीय किसान यूनियन (किसान) के राष्ट्रीय अध्यक्ष पवन ठाकुर ने कड़े शब्दों में कहा कि
“खाड़ी में युद्ध का असर अगर भारत के खेतों तक पहुंचा और किसानों को समय पर खाद नहीं मिली, तो यह सिर्फ संकट नहीं बल्कि सरकार की सीधी नाकामी मानी जाएगी। किसान पहले ही लागत, महंगाई और मौसम की मार झेल रहा है—अब खाद की कमी हुई तो बुआई ठप हो जाएगी।”
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा,
“सरकार अभी भी नहीं चेती तो आने वाले दिनों में खेत खाली और बाजार महंगा होगा। हम साफ कह रहे हैं—किसानों को समय पर फर्टिलाइजर दो, नहीं तो देशभर में बड़ा आंदोलन होगा। किसान को कमजोर समझने की भूल न करें, क्योंकि देश की थाली किसान के हाथ में है।”


