लखनऊ। उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य विभाग वित्तीय वर्ष 2025-26 की समाप्ति से पहले आवंटित बजट का बड़ा हिस्सा खर्च करने में पीछे रह गया है। विभाग को इस वित्तीय वर्ष के लिए कुल 33,019.56 करोड़ रुपये का बजट मिला था, लेकिन अब तक केवल 7,508.74 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके हैं। इस तरह लगभग 56 प्रतिशत बजट अब भी उपयोग से बाहर है, जो स्वास्थ्य सेवाओं की रफ्तार और योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े कर रहा है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार स्वास्थ्य विभाग को मिले कुल बजट में से 24,831.98 करोड़ रुपये की स्वीकृतियां जारी की जा चुकी हैं, बावजूद इसके जमीनी स्तर पर खर्च की स्थिति बेहद कमजोर बनी हुई है। कई अहम और जनहित से जुड़ी योजनाएं बजट उपयोग के मामले में काफी पीछे चल रही हैं।
राज्य कर्मचारी कैशलेस योजना के लिए 150 करोड़ रुपये का प्राविधान किया गया था, लेकिन इसमें से अब तक केवल 50 करोड़ रुपये ही खर्च किए जा सके हैं, जो कुल बजट का महज 33 प्रतिशत है। इमरजेंसी स्वास्थ्य सेवा संचालन के लिए आवंटित 155 करोड़ रुपये की पूरी राशि अब तक खर्च नहीं हो पाई है, जबकि यह सेवा आम लोगों के लिए जीवन रक्षक मानी जाती है।
स्वास्थ्य और खाद्य एवं औषधि नियंत्रण के अंतर्गत 1,080.84 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था, जिसमें से सिर्फ 343.58 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। यानी इस मद में केवल 31.79 प्रतिशत बजट का ही उपयोग हो सका है। आयुष्मान भारत मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना के लिए आवंटित 300 करोड़ रुपये में से 160 करोड़ रुपये अभी भी खर्च से बाहर हैं।
जिला और संयुक्त चिकित्सालयों में उपकरणों की खरीद के लिए दिए गए 30 करोड़ रुपये भी पूरे खर्च नहीं हो पाए हैं। वहीं ग्रामीण चिकित्सालयों में अग्निशमन यंत्रों की व्यवस्था के लिए स्वीकृत 30 करोड़ रुपये में से केवल 16.10 करोड़ रुपये का ही इस्तेमाल किया गया है, जबकि 53.68 प्रतिशत राशि शेष है। हालांकि पैथोलॉजी उपकरणों के संचालन के लिए रिएजेंट खरीद के मद में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही है, जहां 150 करोड़ रुपये में से 109.32 करोड़ रुपये यानी 72.88 प्रतिशत बजट खर्च किया जा चुका है।
इस स्थिति को लेकर शासन स्तर पर चिंता जताई गई है। अपर मुख्य सचिव चिकित्सा शिक्षा एवं स्वास्थ्य अमित कुमार घोष ने स्पष्ट किया है कि सभी योजनाओं को समय रहते पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं और पूंजीगत व्यय की सघन निगरानी की जा रही है, ताकि शेष बजट का समय पर उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
स्वास्थ्य विभाग में बजट खर्च की यह सुस्त रफ्तार ऐसे समय सामने आई है, जब प्रदेश में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी ढांचे की जरूरत लगातार बढ़ रही है। अब देखना होगा कि शेष वित्तीय अवधि में विभाग लंबित बजट को कितना प्रभावी ढंग से जमीन पर उतार पाता है।

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