
एक रहोगे तो साफ़ रहोगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कथन केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारतीय समाज की मूल चेतना है। हिन्दू जोड़ो का संदेश देने वाले बाबा बागेश्वर हों या देशभर के संत-महात्मा, हर कोई आज सनातन एकता, सामाजिक समरसता और भेदभाव से मुक्ति की बात कर रहा है। ऐसे समय में यदि यूजीसी जैसे संवैधानिक संस्थान ऐसे नियम लेकर आते हैं जो समाज को जोडऩे के बजाय विभाजित करने का माध्यम बनें, तो यह महज़ विरोधाभास नहीं, बल्कि एक सोची-समझी और खतरनाक दिशा का संकेत है।
सच्चाई यह है कि आज विश्वविद्यालयों में जाति नहीं, दोस्ती होती है। छात्र एक ही हॉस्टल में रहते हैं, एक ही कक्षा में पढ़ते हैं, साथ खेलते हैं, साथ खाते हैं और साथ भविष्य के सपने देखते हैं। वहाँ न कोई सवर्ण होता है, न दलित, न पिछड़ा—वहाँ सिफऱ् छात्र होता है। विश्वविद्यालय परिसर भारत के उन गिने-चुने सामाजिक क्षेत्रों में रहे हैं जहाँ जाति दीवार नहीं, लगभग इतिहास बन चुकी है। ऐसे में यह सवाल बेहद गंभीर है कि जब कैंपस में भेदभाव है ही नहीं, तो उसे कानून और नियमों के ज़रिये जबरन क्यों घुसाया जा रहा है?
कड़वी सच्चाई यह है कि जातिवाद विश्वविद्यालयों की समस्या नहीं है। जातिवाद समाज में है, राजनीति में है, सत्ता के गलियारों में है। चुनावों में इसका इस्तेमाल होता है, सत्ता पाने और बचाने के लिए इसे जि़ंदा रखा जाता है। लेकिन विश्वविद्यालयों ने इस ज़हर को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया था। अब समाज की इस बीमारी को शिक्षा संस्थानों में फैलाना किसी भी तरह से समाधान नहीं है। यह इलाज नहीं, बल्कि संक्रमण फैलाने की रणनीति है।
इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिम को लड़ाकर शासन किया। आज वही फॉर्मूला नए पैकेज में दोहराया जा रहा है—अब हिन्दू को हिन्दू से, छात्र को छात्र से और समाज को समाज से लड़ाने की कोशिश हो रही है। यूजीसी के नए नियम इसी दिशा में एक खतरनाक प्रयोग हैं, जहाँ समानता और न्याय की भाषा बोलकर नई सामाजिक खाइयाँ खोदी जा रही हैं। यह संयोग नहीं है, यह एक स्पष्ट एजेंडा है—जाति में बाँटो, राज करो।
आज का छात्र पहले से ही बेरोजग़ारी, महंगी शिक्षा, तीव्र प्रतिस्पर्धा और मानसिक दबाव से जूझ रहा है। ऐसे समय में अगर उसे यह बताया जाएगा कि वह पहले छात्र नहीं, बल्कि पहले अपनी जाति है, तो यह उसे शैक्षणिक ही नहीं, मानसिक रूप से भी कमजोर करेगा। जो छात्र आज एक साथ पढ़ते हैं, खेलते हैं और एक ही भारत का सपना देखते हैं, वही छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद कागज़़ी पहचान के नाम पर अलग-अलग खाँचों में बाँट दिए जाएंगे। यह शिक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक विभाजन की फैक्ट्री है।
शिक्षा का स्वभाव जोडऩे का होता है, जबकि सत्ता की राजनीति अक्सर तोडऩे का काम करती है। जब शिक्षा नीति ही पहचान की राजनीति का औज़ार बन जाए, तो यह केवल शिक्षा व्यवस्था पर हमला नहीं होता, बल्कि यह सीधे-सीधे राष्ट्र की सामाजिक एकता पर प्रहार होता है। सनातन परंपरा वसुधैव कुटुम्बकं की बात करती है जहाँ जाति नहीं, कर्म, ज्ञान और चरित्र को महत्व दिया गया है। जब संत समाज निरंतर समरसता का संदेश दे रहा है, तब सरकारी संस्थानों का दायित्व बनता है कि वे समाज को जोड़ें, न कि पुराने घावों को कुरेदकर उन्हें और गहरा करें।
अब समय आधे-अधूरे सुधारों का नहीं, बल्कि स्पष्ट और साहसिक फैसलों का है। विश्वविद्यालयों में नियम बिल्कुल साफ़ होना चाहिए— यहाँ न कोई सवर्ण होगा, न एससी-एसटी-ओबीसी, यहाँ सिफऱ् और सिफऱ् छात्र होंगे। विश्वविद्यालय परिसर के भीतर किसी भी प्रकार का जातिवाद, जातिगत पहचान का प्रदर्शन या उसका प्रचार सीधा अपराध माना जाए। जो भी छात्र या संगठन ऐसा करता पाया जाए, उसे बिना किसी दबाव के निष्कासित किया जाए। क्योंकि शिक्षा का मंदिर किसी भी कीमत पर सामाजिक ज़हर का अड्डा नहीं बन सकता।
आज तक विश्वविद्यालय ही वह अंतिम स्थान थे, जो भेदभाव से काफी हद तक मुक्त थे। यूजीसी के इन नियमों के ज़रिये अगर वहाँ भी विभाजन की रेखाएँ खींची जाएँगी, तो यह शिक्षा ही नहीं, पूरे समाज पर एक कलंक होगा। छात्र किसी भी हालत में वोट बैंक नहीं हैं—वे भारत का भविष्य हैं।
आज अक्षय कुमार की फिल्म खट्टा मीठा का ये डायलॉग सही मालूम होता है विदेशों में जाओ तो वहा अमेरिकन, फ्रांसीसी, चीनी, इंग्लिशमैन, मिलेंगे और इस देश में मराठी बंगाली पंजाबी हिंदी तमिल तेलुगु मिलेंगे मगर हिंदुस्तानी नहीं मिलेगा, इस देश में देशभक्ति सिर्फ इंडिया पाकिस्तान के क्रिकेट मैच में दिखाई देती है बाकी सब अपना पेट फुलाने में लगे रहते है।
यूजीसी का यह नियम शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि एक खतरनाक सामाजिक प्रयोग है—और वह भी ऐसा प्रयोग जो एकजुट होते समाज में कृत्रिम विभाजन पैदा कर सकता है। अगर सच में देश को मजबूत बनाना है, तो रास्ता बिल्कुल साफ है—समाज से जातिवाद खत्म करो, विश्वविद्यालयों को राजनीति से मुक्त रखो और छात्र को छात्र ही रहने दो, किसी भी तरह के वोट बैंक में मत बदलो।
क्योंकि एक रहेंगे तो मज़बूत रहेंगे, और मज़बूत समाज से ही मज़बूत भारत बन सकता है।
(लेखक यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप के डिप्टी एडिटर हैं।)






