
19 जनवरी भारतीय इतिहास का वह दिन है, जब मेवाड़ की धरती ने अपने महान सपूत महाराणा प्रताप को देह रूप में विदा किया, लेकिन उनके विचार, उनका संघर्ष और उनका स्वाभिमान अमर हो गया। आज उनकी पुण्यतिथि पर देश उस योद्धा को नमन करता है, जिसने सत्ता के सामने झुकने के बजाय कांटों भरा वनपथ चुनना स्वीकार किया।
महाराणा प्रताप का जीवन किसी ऐश्वर्यशाली राजमहल की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, त्याग और स्वतंत्रता की तपस्या की गाथा है। 9 मई 1540 को कुंभलगढ़ दुर्ग में जन्मे प्रताप ने 1572 में मेवाड़ की गद्दी संभाली, लेकिन उनका वास्तविक सिंहासन जनता का विश्वास और मातृभूमि की स्वतंत्रता थी।
पुण्यतिथि नहीं, आत्मसम्मान का स्मरण दिवस
आज जब हम उनकी पुण्यतिथि मनाते हैं, तो यह केवल एक ऐतिहासिक स्मरण नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। उस दौर में जब अधिकांश राजपूत शासक मुगल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार कर चुके थे, महाराणा प्रताप ने स्पष्ट कहा “मेवाड़ झुकेगा नहीं।” अकबर की ओर से आए वैभव, पद और सुरक्षा के प्रस्तावों को ठुकराकर महाराणा प्रताप ने सिद्ध कर दिया कि स्वतंत्रता का मूल्य किसी भी सुविधा से बड़ा होता है।
हल्दीघाटी: पराजय नहीं, प्रेरणा
1576 का हल्दीघाटी युद्ध भले ही सामरिक दृष्टि से निर्णायक न रहा हो, लेकिन यह युद्ध भारतीय चेतना में साहस का स्थायी प्रतीक बन गया। सीमित संसाधनों के बावजूद महाराणा प्रताप ने जिस वीरता से मुगल सेना का सामना किया, वह आज भी प्रेरणा देता है। चेतक का बलिदान और स्वयं महाराणा प्रताप का अदम्य साहस इतिहास के स्वर्णिम अध्याय हैं।
वन, भूख और संघर्ष—पर आत्मसमर्पण नहीं
हल्दीघाटी के बाद महाराणा प्रताप ने पहाड़ों और जंगलों में रहकर गुरिल्ला युद्ध किया। परिवार ने कष्ट सहे, बच्चों ने अभाव देखा, लेकिन प्रताप ने कभी मुगल सत्ता के आगे सिर नहीं झुकाया। यह संघर्ष उन्हें केवल योद्धा नहीं, बल्कि स्वतंत्रता का संत बना देता है।
19 जनवरी 1597: देहांत, विचार अमर
19 जनवरी 1597 को चावंड में शिकार के दौरान लगी चोटों के कारण महाराणा प्रताप का निधन हुआ। वे 56 वर्ष के थे। देह चली गई, लेकिन उनका जीवन दर्शन—“स्वाभिमान से बड़ा कुछ नहीं”—आज भी जीवित है। उनके पुत्र अमर सिंह प्रथम ने आगे चलकर मेवाड़ की विरासत को संभाला।
आज के भारत के लिए महाराणा प्रताप
आज, जब समझौते आसान और सिद्धांत कठिन लगते हैं, महाराणा प्रताप का जीवन हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र, संस्कृति और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए त्याग अनिवार्य होता है। महाराणा प्रताप केवल इतिहास नहीं, वे चेतना हैं। वे केवल राजा नहीं, वे विचार हैं। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि नहीं, संकल्प की आवश्यकता है कि हम भी अन्याय के सामने झुकेंगे नहीं।
महाराणा प्रताप अमर रहें।
(लेखक यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप के डिप्टी एडिटर हैं)


