रिश्ते | जीवन-दर्शन | भाईचारा

जहाँ भाई साथ खड़ा हो, वहाँ सत्ता, सेना और षड्यंत्र भी बौने पड़ जाते हैं

इस संसार में रिश्तों की कोई कमी नहीं है। हर मोड़ पर नए संबंध बनते हैं, निभते हैं और टूट भी जाते हैं। लेकिन इन्हीं रिश्तों की भीड़ में एक रिश्ता ऐसा है, जो बिना दिखावे के सबसे गहरा होता है, बिना शोर के सबसे ताकतवर साबित होता है—भाई का रिश्ता। यह कोई औपचारिक समझौता नहीं, बल्कि जीवन की जड़ों में समाया हुआ वह विश्वास है, जो विपरीत परिस्थितियों में इंसान को अकेला नहीं पड़ने देता।
भाई वह संबंध है, जिसे निभाने के लिए न भाषण चाहिए, न वचनपत्र। यह रिश्ता शब्दों से पहले समझता है और हालात से पहले खड़ा होता है। यही कारण है कि जीवन का अनुभव बार-बार यह सिखाता है—अगर भाई साथ हो, तो सबसे कठिन युद्ध भी जीते जा सकते हैं; लेकिन यदि वही भाई विरोध में खड़ा हो जाए, तो साधारण-सी लड़ाई भी हार में बदल जाती है। यह कथन केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि इतिहास और समाज दोनों का निष्कर्ष है।
भाई का रिश्ता तर्क की कसौटी पर नहीं, भरोसे की जमीन पर खड़ा होता है। वह लाभ-हानि का गणित नहीं समझता, वह सिर्फ अपनापन पहचानता है। बचपन की शरारतों से लेकर जीवन की सबसे बड़ी जिम्मेदारियों तक, भाई हर दौर का मौन साक्षी होता है। वह आपकी कामयाबी में मंच साझा करने नहीं आता, लेकिन आपकी असफलता में सबसे पहले आपके कंधे पर हाथ रखता है। वह गिरने पर ताली नहीं बजाता, बल्कि बिना सवाल किए हाथ बढ़ा देता है।
भारतीय संस्कृति में भाई को केवल परिवार का सदस्य नहीं, बल्कि जीवन का संरक्षक और नैतिक संबल माना गया है। हमारी परंपराएं, हमारे ग्रंथ और हमारे महाकाव्य इस रिश्ते की शक्ति को बार-बार रेखांकित करते हैं। रामायण इसका सबसे जीवंत उदाहरण है। श्रीराम का पराक्रम, मर्यादा और धर्म जितना महान था, उतनी ही महत्वपूर्ण उनके भाइयों की भूमिका भी थी। लक्ष्मण का त्याग केवल पारिवारिक कर्तव्य नहीं, बल्कि निःस्वार्थ भाईचारे की पराकाष्ठा था। उन्होंने न सत्ता चाही, न यश, न पहचान—बस अपने भाई के साथ खड़े रहने का संकल्प लिया। यही भाई की असली ताकत होती है—वह यह नहीं पूछता कि उसे क्या मिलेगा, वह केवल यह देखता है कि उसके भाई को क्या चाहिए।
इसके विपरीत रावण का उदाहरण यह बताता है कि अपार शक्ति, विशाल सेना और असीम वैभव भी तब अर्थहीन हो जाते हैं, जब घर के भीतर विश्वास टूट जाता है। विभीषण का रावण से अलग होना केवल राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि यह उस आंतरिक विघटन का प्रतीक था, जिसने लंका की नींव को कमजोर कर दिया। जहां भाई-भाई के बीच भरोसा नहीं बचता, वहां साम्राज्य भी टिक नहीं पाते। रावण की हार केवल श्रीराम की विजय नहीं थी, बल्कि टूटे हुए भाईचारे की पराजय भी थी।
वास्तव में भाई इंसान का पहला मित्र होता है और आखिरी सहारा भी। दोस्त बदल जाते हैं, परिस्थितियां करवट ले लेती हैं, प्रेम की परिभाषाएं समय के साथ बदल जाती हैं, लेकिन भाई का रिश्ता उम्र के साथ और गहराता जाता है। आज के दौर में, जब स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत सफलता की दौड़ ने रिश्तों को कमजोर करना शुरू कर दिया है, तब भाईचारे का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ जाता है। जमीन-जायदाद, पद-प्रतिष्ठा और अहंकार जैसे तत्व अक्सर भाइयों के बीच दीवार खड़ी कर देते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि इन सबसे ऊपर रिश्ता होना चाहिए।
कहा भी जाता है—“भाई सिर्फ कहे और चल दो।”
और कई बार तो भाई को कहने की भी जरूरत नहीं पड़ती। वह आंखों में झांककर हालात समझ लेता है। वह बिना शोर किए, बिना प्रचार किए साथ चल देता है। यही वह रिश्ता है, जिसमें संवाद से ज्यादा समझ होती है और शब्दों से ज्यादा विश्वास।
भाई का साथ इंसान को नैतिक साहस देता है। जब किसी व्यक्ति को यह भरोसा होता है कि उसके पीछे उसका भाई खड़ा है, तो वह गलत के सामने झुकता नहीं, अन्याय से समझौता नहीं करता और संघर्ष से भागता नहीं। यही कारण है कि मजबूत भाईचारा केवल परिवार को ही नहीं, पूरे समाज को मजबूती देता है। टूटते रिश्ते कमजोर समाज की पहचान होते हैं, जबकि जुड़े हुए भाई एक सशक्त भविष्य की नींव रखते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम रिश्तों को लाभ-हानि के तराजू पर तौलना बंद करें। भाई को प्रतिद्वंद्वी नहीं, संबल के रूप में देखें। मतभेद हों तो संवाद से सुलझाएं और गलतफहमियों को समय रहते दूर करें। क्योंकि जीवन में बहुत कुछ दोबारा मिल सकता है—दोस्त भी, अवसर भी, यहां तक कि प्रेम भी—लेकिन सगा भाई दोबारा नहीं मिलता।
अंततः भाई वह रिश्ता है, जो दिखाई कम देता है, लेकिन जीवन के हर मोड़ पर महसूस होता है। वह छांव भी है और ढाल भी, वह ताकत भी है और भरोसा भी। भाई साथ हो, तो हार भी अनुभव बन जाती है और जीत इतिहास। और भाई न हो, तो सबसे बड़ी सफलता भी अधूरी लगती है।
निस्संदेह, भाई से बढ़कर इस दुनिया में सच में कुछ नहीं।
(लेखक यूथ इंडिया न्यूज़ ग्रुप के डिप्टी एडिटर हैं।)

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