चिराग जलाते ही अंधेरे रूठ जाते हैं!!

जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम सब कुछ ठीक करने निकलते हैं, लेकिन हर किसी को संतुष्ट कर पाना हमारे बस में नहीं होता। रिश्तों की दुनिया भी कुछ ऐसी ही है—जहाँ एक ओर उम्मीदें हैं, तो दूसरी ओर शिकायतें; जहाँ अपनापन है, वहीं असहमति भी।
जब हम किसी रिश्ते में सच, स्पष्टता और रोशनी लाते हैं, तो यह जरूरी नहीं कि हर कोई उसे स्वीकार करे। जैसे ही चिराग जलता है, अंधेरा स्वाभाविक रूप से दूर हो जाता है—लेकिन अंधेरा कभी यह नहीं कहता कि वह खुशी-खुशी जा रहा है। वह रूठता है, विरोध करता है, कभी-कभी तो रोशनी को ही दोषी ठहराता है।यही हाल रिश्तों का है।जब आप ईमानदार होते हैं, जब आप सही के साथ खड़े होते हैं, जब आप दो टूक बोलते हैं तो कुछ लोग पास आते हैं, और कुछ अपने आप दूर हो जाते हैं।
यह दूरी आपकी गलती नहीं होती। यह इस बात का संकेत होती है कि अब रिश्तों की कसौटी बदल चुकी है।अक्सर हम यह सोचकर खुद को थका लेते हैं किसब नाराज़ क्यों हो गए? मैंने ऐसा क्या कर दिया? लेकिन सच यह है कि हर रिश्ते को निभाने के लिए समझौता जरूरी नहीं होता, और हर नाराजग़ी को मनाना आपकी जिम्मेदारी भी नहीं होती।जो लोग आपके उजाले से असहज होते हैं,वे अंधेरे के अभ्यस्त होते हैं।
उन्हें आपकी सच्चाई नहीं, आपकी चुप्पी पसंद आती है। इसलिए जरूरी है कि हम यह स्वीकार करें— सभी को खुश रखना असंभव है, सही होना, लोकप्रिय होने से ज्यादा जरूरी है, रिश्ते वही टिकते हैं, जो रोशनी सह सकें।
चिराग जलाइए भले ही कुछ अंधेरे रूठ जाएँ। क्योंकि जो साथ रहने लायक होंगे,वे रोशनी में भी आपके साथ खड़े रहेंगे।
(लेखक यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप के डिप्टी एडिटर हैं)

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