सूर्या अग्निहोत्री
जब शिक्षा मेरिट सिखाए और राजनीति मैनेजमेंट,
तो हार केवल सिद्धांतों की नहीं भविष्य की होती है।
हमारी ज़िंदगी की पहली पाठशाला शिक्षा होती है। यहीं से हमारे सोचने, समझने और सही-गलत को परखने की नींव पड़ती है। स्कूल हमें सिर्फ़ किताबें नहीं पढ़ाता, बल्कि जीवन के सिद्धांत सिखाता है—मेहनत का फल मिलता है, योग्यता का सम्मान होता है और ईमानदार प्रतिस्पर्धा से ही श्रेष्ठता तय होती है। यही कारण है कि कक्षा में वही छात्र प्रथम स्थान प्राप्त करता है जिसके अंक सबसे अधिक होते हैं।
अगर किसी बच्चे ने 70 प्रतिशत अंक प्राप्त किए हैं, तो वही टॉपर कहलाता है। यह कभी नहीं कहा जाता कि दो बच्चे 40–40 प्रतिशत लाकर मिल जाएँ और संयुक्त रूप से प्रथम स्थान बाँट लें। शिक्षा व्यवस्था यह साफ़ संदेश देती है कि योग्यता व्यक्तिगत होती है, उधार नहीं ली जा सकती।
यही सिद्धांत खेलों में भी पूरी सख़्ती से लागू होता है। खेल का मैदान न्याय का सबसे बड़ा उदाहरण है। जो टीम बेहतर खेलती है, वही जीतती है। हारने वाली टीम चाहे कितनी भी कोशिश कर ले, जीतने वाली टीम के साथ मिलकर चैंपियन नहीं बन सकती। ट्रॉफी उसी के हाथ जाती है जिसने मैदान में श्रेष्ठ प्रदर्शन किया हो।
लेकिन जैसे ही हम राजनीति के मैदान में कदम रखते हैं, यही सिद्धांत उलट जाते हैं।
राजनीति में क्यों बदल जाता है शिक्षा का नियम?
राजनीति में वह दृश्य आम है जहाँ सबसे ज़्यादा वोट पाने वाली पार्टी सत्ता से बाहर रह जाती है और उससे कम वोट पाने वाली कई पार्टियाँ आपस में गठबंधन कर सरकार बना लेती हैं। यह दृश्य केवल राजनीतिक गणित नहीं है, बल्कि शिक्षा और नैतिकता के उसूलों पर सीधा प्रश्न है।
सवाल बहुत सरल, लेकिन बेहद गंभीर है—
अगर गठबंधन जीत का सबसे सही और नैतिक रास्ता है, तो फिर उसे शिक्षा और खेलों में क्यों अमान्य माना जाता है?
और अगर शिक्षा व खेलों में गठबंधन गलत है, तो राजनीति में उसे सही कैसे ठहराया जा सकता है?
यह विरोधाभास केवल व्यवस्था का नहीं, बल्कि सोच का भी है। हम बच्चों को सिखाते हैं कि व्यक्तिगत क्षमता, मेहनत और ईमानदारी से आगे बढ़ो, लेकिन जब वही बच्चे बड़े होते हैं और राजनीति को देखते हैं, तो उन्हें एक अलग ही पाठ पढ़ाया जाता है—कि सत्ता पाने के लिए समझौते, जोड़-तोड़, अवसरवाद और अंकगणित ज़्यादा ज़रूरी है।
दोहरी शिक्षा: बच्चों को कुछ और, देश को कुछ और
यही दोहरापन सबसे खतरनाक है।
स्कूल में बच्चा सीखता है—
“मेहनत करो, टॉपर बनो।”
राजनीति में वही बच्चा देखता है—
“कमज़ोर मिल जाएँ, तो ताक़त बन जाती है।”
यह विरोधाभास नई पीढ़ी के मन में गहरी उलझन पैदा करता है। उसे लगने लगता है कि किताबों में लिखी नैतिकता केवल परीक्षा पास करने के लिए है, असली ज़िंदगी में उसकी कोई उपयोगिता नहीं। यही सोच धीरे-धीरे ईमानदारी को कमज़ोर और चालाकी को मज़बूत बनाती है।
लोकतंत्र का मूल सिद्धांत क्या कहता है?
लोकतंत्र का मूल अर्थ है—जनता का शासन और जनता की इच्छा का सबसे स्पष्ट पैमाना है—मतदान।
सामान्य बुद्धि भी यही कहती है कि जिसे जनता ने सबसे अधिक समर्थन दिया हो, वही शासन करने का पहला हक़दार होना चाहिए। लेकिन गठबंधन की राजनीति इस सिद्धांत को धुंधला कर देती है। यहाँ संख्या महत्वपूर्ण हो जाती है, समर्थन नहीं। यहाँ जनादेश को जोड़-घटाव में बदल दिया जाता है।
यह वही स्थिति है जैसे किसी परीक्षा में सबसे ज़्यादा अंक लाने वाला छात्र पीछे बैठा हो और कम अंक लाने वाले मिलकर मेडल ले जाएँ।
क्या गठबंधन हमेशा गलत है?
यह कहना भी अधूरा होगा कि गठबंधन हर हाल में गलत है। कई बार विविध समाज और बहुलता वाले देश में सहयोग ज़रूरी होता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब गठबंधन जनादेश के विरुद्ध खड़ा हो जाए।
अगर गठबंधन जनता की स्पष्ट इच्छा के खिलाफ़ बनता है, तो वह लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुँचाता है। वह संदेश देता है कि जनता का फैसला अंतिम नहीं, बल्कि प्रबंधनीय है।
शिक्षा, खेल और राजनीति—तीनों में एक ही नियम क्यों नहीं?
यहीं सबसे बड़ा सवाल उठता है अगर गठबंधन सही है, तो उसे हर क्षेत्र में लागू किया जाए।
स्कूल में भी संयुक्त टॉपर घोषित किए जाएँ, खेलों में भी हारती हुई टीमें मिलकर विजेता बन जाएँ।
और अगर यह सब हमें अस्वीकार्य लगता है, तो राजनीति में इसे नैतिक कैसे माना जा सकता है?
या तो समाज को यह स्वीकार करना होगा कि गठबंधन एक वैध सिद्धांत है और उसे हर जगह लागू करना होगा, या फिर राजनीति को भी वही अनुशासन अपनाना होगा जो शिक्षा और खेल सिखाते हैं—योग्यता सर्वोपरि है।
युवाओं पर पड़ता सबसे गहरा असर
इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा नुकसान युवाओं को होता है। युवा जब मेहनत करता है, पढ़ाई करता है, प्रतियोगी परीक्षाओं में संघर्ष करता है, तो उसे यह भरोसा चाहिए कि उसका मूल्यांकन निष्पक्ष होगा। लेकिन जब वही युवा राजनीति में विपरीत उदाहरण देखता है, तो उसका भरोसा टूटता है।
यही कारण है कि आज का युवा राजनीति से दूर होता जा रहा है। उसे लगता है कि यह क्षेत्र योग्यता का नहीं, समीकरणों का है।
आगे का रास्ता क्या हो?
समाधान किसी एक नियम में नहीं, बल्कि सोच के सुधार में है।
राजनीति को यह तय करना होगा कि वह शिक्षा से सीखेगी या उसे झुठलाएगी।
अगर हम सच में एक मज़बूत लोकतंत्र चाहते हैं, तो सत्ता उसी के हाथ में जानी चाहिए जिसे जनता ने सबसे अधिक समर्थन दिया हो। गठबंधन यदि हों भी, तो वे जनादेश के सम्मान के साथ हों, उसके विरुद्ध नहीं।
यह बात कठोर है, गहरी है, लेकिन सत्य है या तो गठबंधन को हर क्षेत्र में सही माना जाए,
या फिर राजनीति से उसे हटाकर योग्यता और जनमत का सम्मान किया जाए।
तभी शिक्षा और राजनीति के बीच की यह खाई पाटी जा सकती है,
और तभी आने वाली पीढ़ी यह विश्वास कर पाएगी कि जो उन्हें स्कूल में सिखाया गया था, वही देश में भी लागू होता है।
(लेखक यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप के डिप्टी एडिटर हैं।)






