“हर पदक के पीछे समान पसीना है, फिर सम्मान में फर्क क्यों?”

भारत में खेल का मतलब अब लगभग “क्रिकेट” हो चुका है। 2024 में जब भारत ने आईसीसी पुरुष टी20 विश्व कप 2024 जीता, तो देश की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा। शहर रुक गए, ढोल-नगाड़े बजे, खुली बस में विजय यात्रा निकली। यह दृश्य किसी राष्ट्रीय उत्सव से कम नहीं था।

लेकिन यही देश तब खामोश क्यों हो जाता है जब उसकी हॉकी टीम अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट जीतकर लौटती है? एयरपोर्ट पर भीड़ क्यों नहीं उमड़ती? क्यों ओलंपिक में पदक जीतकर आने वाले खिलाड़ियों का स्वागत कुछ औपचारिक कार्यक्रमों तक सिमट जाता है? क्या उनका संघर्ष कम था? क्या उनकी जीत कम ऐतिहासिक थी?

इंडियन प्रीमियर लीग की टीमों की ब्रांड वैल्यू हजारों करोड़ में है। रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु या चेन्नई सुपर किंग्स की जीत पर रातभर जश्न चलता है। खिलाड़ियों की नीलामी करोड़ों में होती है, विज्ञापन उनके नाम पर बिकते हैं, मीडिया 24 घंटे बहस करता है।

दूसरी ओर, हॉकी, फुटबॉल, एथलेटिक्स या कुश्ती के खिलाड़ी अक्सर संसाधनों के लिए जूझते नजर आते हैं। वे जीतते भी हैं तो खबर अखबार के कोने में सिमट जाती है। हारते हैं तो चर्चा तक नहीं होती। यह सिर्फ संयोग नहीं, यह हमारी सामूहिक प्राथमिकताओं का आईना है।

विडंबना देखिए—जब लियोनेल मेस्सी भारत आते हैं तो उन्हें देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है। लेकिन अपने ही देश के कप्तान सुनील छेत्री के लिए क्या हमने कभी वैसा जोश दिखाया? क्या स्कूलों में बच्चों को उनके रिकॉर्ड उसी उत्साह से बताए जाते हैं? क्या मोहल्लों में उनके नाम के नारे लगते हैं?

गली-गली में क्रिकेट खेला जाता है। हर घर में बल्ला मिल जाएगा। लेकिन कितने मोहल्लों में फुटबॉल का मैदान है? कितने सरकारी स्कूलों में हॉकी स्टिक उपलब्ध है? कितने बच्चों को प्रशिक्षित कोच मिल पाते हैं? अगर सुविधाएं ही नहीं होंगी तो प्रतिभा कहां से निकलेगी?

सबसे बड़ा सवाल सरकार और व्यवस्था से है। क्या खेल नीति संतुलित है? क्या बजट और बुनियादी ढांचा सभी खेलों में समान रूप से बंट रहा है? क्या कॉरपोरेट निवेश क्रिकेट से बाहर निकलकर अन्य खेलों तक पहुंच रहा है? अगर जवाब “नहीं” है, तो फिर “खेल महाशक्ति” बनने का दावा खोखला है।

समस्या क्रिकेट नहीं है। समस्या उस अंधे उत्साह से है जिसने बाकी खेलों की सांसें धीमी कर दी हैं। जब समाज तालियां सिर्फ एक खेल के लिए बचाकर रखता है, तो बाकी खेलों की प्रतिभाएं धीरे-धीरे हाशिए पर चली जाती हैं। हजारों बच्चे जो फुटबॉल, हॉकी या एथलेटिक्स में चमक सकते थे, वे भी क्रिकेट की ओर इसलिए मुड़ जाते हैं क्योंकि रोशनी वहीं है।

अब फैसला हमें करना है। क्या हम ऐसा भारत चाहते हैं जहां खेल संस्कृति एक ही खेल तक सीमित हो? या ऐसा भारत जहां हर खिलाड़ी की जीत पर समान उत्सव हो?

अगर हम सच में खेल प्रेमी हैं, तो हमें अपनी प्राथमिकताएं बदलनी होंगी। एयरपोर्ट की भीड़ सिर्फ क्रिकेटरों के लिए नहीं, ओलंपिक पदक विजेताओं के लिए भी होनी चाहिए। विजय परेड सिर्फ लीग चैंपियनों के लिए नहीं, राष्ट्रीय टीमों के लिए भी निकलनी चाहिए। वरना इतिहास यही दर्ज करेगा—भारत में प्रतिभा की कमी नहीं थी, कमी थी तो बस हमारी नजरों और नीयत की।

(लेखक यूथ इंडिया न्यूज़ ग्रुप के डिप्टी एडिटर हैं)
प्रस्तुति: यूथ इंडिया

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