
फिल्म जगत और खेल जगत की चुप्पी पर बड़ा सवाल
भारत ने पिछले दो दशकों में आतंकवाद के नाम पर जितना दर्द झेला है, उतना शायद ही किसी सभ्य राष्ट्र ने देखा हो। 26/11, पुलवामा, उरी, पहलगाम और हाल हीमें हुए दिल्ली ब्लास्ट इन हर हमले की तारीख आज भी भारतीयों के सीने को छलनी कर देती है। हर बार देश की जनता एकजुट हुई, सेना खड़ी रही, और सरकारों ने कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य स्तर पर कड़े फैसले लिए।
परंतु क्या हैरानी नहीं होती, जब सीमा पर गोलियां चल रही होती हैं, जवान शहीद हो रहे होते हैं, और इसी बीच फिल्म इंडस्ट्री तथा खेल जगत कलात्मकता व स्पोर्ट्समैनशिप के नाम पर पाकिस्तान के साथ रिश्ते निभाते नजर आते हैं? एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री और खेल जगत यह दोनों क्षेत्र आज देश की सबसे बड़ी विडंबना बन चुके हैं—सीमा पर पाकिस्तान दुश्मन है, लेकिन कैमरा और स्टेडियम में वह हीरो लग रहे हैं।
क्या यह वही देश है, जहाँ आतंकियों के नाम पर पाकिस्तान की निंदा तो होती है, पर स्क्रीन पर उसी पाकिस्तान को चमकाने का उत्साह भी जारी रहता है?
भारत में जब भी पाकिस्तान से हमला होता है, देश भर में आक्रोश फैल जाता है। लोग मोमबत्तियाँ जलाते हैं, घरों में मातम होता है, और सोशल मीडिया वी वॉन्ट जस्टिस से भर जाता है। लेकिन ठीक इसी माहौल में फिल्म इंडस्ट्री की चमक-दमक वाले कमरे में बैठकर लोग यह तय कर रहे होते हैं कि कौन सा पाकिस्तानी एक्टर अगली फिल्म में कास्ट होगा, कौन सा पाकिस्तानी चेहरा भारतीय सिनेमाघरों को और चमका सकता है, और कौन सा कलाकार इंडिया-पाक अमन का चेहरा बन सकता है।
यह वही इंडस्ट्री है जो 26/11 के बाद भी फवाद खान, माहिरा खान, हुमैमा मलिक, सबा कमर, सजल अली, इमरान अब्बास, मावरा होकने और हाल ही में सरदार जी 3 में हानिया आमिर को सिर पर बिठाए घूमती रही। इनके लिए पाकिस्तान आतंकी राष्ट्र नहीं, बल्कि एक मार्केटेबल टैलेंट पूल है।
कूटनीति कड़ी, पर बॉलीवुड और खेल जगत ‘नरमी’ पर उतरे, क्यों?
पहलगाम जैसे हमले के बाद भारत ने पल-पल कठिन कदम उठाए सिंधु जल संधि पर पुनर्विचार, अटारी बॉर्डर बंद, पाक हाईकमीशन कर्मचारियों में कटौती, व्यापारिक मार्ग सीमित, भारत ने हर मोर्चे पर पाकिस्तान को संदेश दिया कि आतंकवाद का जवाब कूटनीति और ताकत से दिया जाएगा।
लेकिन इसी समय, भारत के फिल्म स्टूडियो में काम जारी था। इसी समय खेल महासंघों ने पाकिस्तान के साथ मैचों के फ़ॉर्मेट बनाए। इसी समय सोशल मीडिया पर पाकिस्तानियों के साथ क्रिकेट खेलने की तस्वीरें सजाईं जा रही थीं।
सवाल सीधा है— क्या फिल्म जगत और खेल जगत इस देश का हिस्सा नहीं?
जब 26/11 की आग ठंडी भी नहीं हुई थी, तब भी बॉलीवुड ने बढ़ाए रिश्ते
भारत में जब 26/11 की यादें ताजा थीं, तब भी कई पाकिस्तानी कलाकार बड़े बैनरों की फिल्मों में नजर आए जिसमें सारा लोरें उन्होंने पूजा भट्ट की फिल्म कजरा रे से 2010 में बॉलीवुड में डेब्यू किया था। इसके अलावा वह मर्डर 3 (2013) में भी नजर आईं, माहिरा खान — रईस, सबा कमर — हिंदी मीडियम, हुमैमा मलिक — राजा नटवरलाल, मावरा होक़ — सनम तेरी कसम, सजल अली — मॉम, फवाद खान — खूबसूरत, कपूर एंड सन्स, ए दिल है मुश्किल, इमरान अब्बास — क्रिएचर 3डी, ए दिल है मुश्किल, आर्मेना खान- हफिज़़ में नजर आईं। हांलांकि इसमें से सबसे बड़ी और अहम बाद ये है कि 27 जून को आई सरदार जी 3 में फेमस पाकिस्तानी एक्ट्रेस हानिया आमिर नजर आईं थीं। जबकि पहलगाम अटैक (22 अप्रैल 2025) के बाद हमारे पीएम ने पाकिस्तान से सभी रिश्ते ख्त्म करने का एलान कर दिया था। फिर भी भारतीयों को इस फिल्म मे हानिया आतिर को देखना पड़ा।
गौरतलब है कि सितंबर 2016 में हुए उरी हमले के बाद, इंडियन मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन ने पाकिस्तानी कलाकारों और तकनीशियनों पर भारत में काम करने के लिए पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव पारित किया। इस प्रतिबंध के कारण माहिरा खान और फवाद खान जैसे कलाकारों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लेकिन 2018 के बाद हिंदी सिनेमा में आई पाकिस्तानी अभिनेत्रियों में कुब्रा खान और युम्ना जैदी शामिल हैं। इसके अलावा, कुछ अन्य अभिनेत्रियां जिन्होंने इस दौरान काम किया या जिनकी हिंदी फिल्मों में उपस्थिति दर्ज हुई, वे हैं इक्वा अजीज, दुर-ए-फिशान सलीम, अदना हैदर और सजल अली (हालांकि उनकी शुरुआत 2017 में मॉम से हुई थी)। क्या ये वही देश है जहाँ आतंकियों के सेफ-हेवन पाकिस्तान की निंदा की जाती है और साथ ही पाकिस्तान का ग्लैमर भी आयात किया जाता है?
क्या हमारे सैनिक सिर्फ शहीद होने के लिए हैं और फिल्म उद्योग सिर्फ कमाई के लिए?
खेल जगत:भावना की बात करते हैं, पर जज़्बा किसके साथ है?
पहलगाम हमले के बाद एशिया कप में एक नहीं, दो भारत-पाक मैच कराए गए। दुश्मन की गोली अभी जवानों और आम जनता के शरीर से खून निकाल ही रही थी, तो वहीं दुनिया को खेल भावना दिखाने का बड़ा मंच तैयार हो रहा था।
मैच के बाद यह दिखाने की कोशिश की गई कि भारतीय खिलाडिय़ों ने पाक खिलाडिय़ों से हाथ नहीं मिलाया। पर ये प्रतीकात्मक विरोध क्या शहीदों की शहादत का बोझ कम करता है? क्या सिर्फ हाथ न मिलाना ही देशभक्ति का पैमाना बन गया? और फिर दुबई का स्टेडियम भारतीय दर्शकों से खचाखच भरा हुआ। क्या पहलगाम में शहीद हुए नागरिको के परिवारों ने यह दृश्य देखकर राहत की सांस ली होगी?
सबसे बड़ा अपमान तो तब होता है जब दुबई और अन्य देशों में भारत-पाक मैच देखने के लिए भारतीय फैंस की भीड़ उमड़ पड़ती है। वे सीटें भरते हैं, टिकट खरीदते हैं, पाकिस्तान के मैच को करोड़ों में बेचने लायक बनाते हैं—और फिर सोशल मीडिया पर देशभक्ति की बातें भी करते हैं। क्या उन फैंस ने पहलगाम के शहीदों के परिवारों को यह दिखाकर गर्व दिलाया कि देखो—हम पाकिस्तान के खिलाफ मैच देखने आए हैं?
वाह! क्या विरोध है!, क्या हाथ न मिलाने से शहीदों का बदला पूरा हो गया?, क्या सिर्फ स्टेडियम में पाकिस्तान के खिलाफ चिल्लाने से भारत की लड़ाई जीत ली गई? आगे भी यही तमाशा जारी रहेगा। आईसीसी और बीसीसीआई कब समझेंगे कि यह सिर्फ क्रिकेट नहीं, भावनाओं का भी सवाल है, इस पर कोई एक्शन ना लिये जाने पर आईसीसी ने टी-20 वर्ल्ड कप 2026 में फिर भारत-पाकिस्तान को एक ही ग्रुप में रखा गया। हर बार की तरह वही कहानी करोड़ों की टीआरपी स्पॉन्सरशिप की बाढ़, दोनों देशों की खचाखच भरी स्क्रीनें और फिर यह सिर्फ खेल है का रटा-रटाया बयान, यदि यह सिर्फ एक खेल है, तो सीमा पर तैनात जवानों का दर्द सिर्फ एक रिपोर्ट माना जा सकता है?
क्या भारतीय सेना ही अकेले लड़ रही है पाकिस्तान से? यह सबसे बड़ा सवाल है, और यह सवाल तीखा है क्योंकि सच कड़वा होता है। देश की सरहद पर जवान, ठंड में जमते हैं, गर्मियों में जलते हैं, ऑपरेशनों में जान देते हैं, परिवारों को अनाथ छोड़ जाते हैं और इसी बीच, फिल्म इंडस्ट्री और खेल जगत, पाकिस्तान से अरबों की कमाई का मौका देखते हैं, पाकिस्तानी कलाकारों को आर्ट का सम्मान बताते हैं, पाकिस्तान मैचों को दुनिया का सबसे बड़ा मुकाबला कहकर बेचते हैं क्या यह दोहरा व्यवहार देशभक्ति है? क्या यह राष्ट्रहित है? या सिर्फ टीआरपी और कमाई का खेल?
भारत की जनता पाकिस्तान के हमलों से आहत होती है। भारत के नेता कूटनीतिक लड़ाई लड़ते हैं। भारत के जवान खून बहाते हैं। पर फिल्म जगत और खेल जगत पाकिस्तान को दुश्मन मानते ही नहीं, मानेंगे भी नहीं क्यों क्योंकि इनके लिए दुश्मनी नहीं, बिजऩेस मॉडल मायने रखता है।
देशभक्ति सिर्फ सेना की जिम्मेदारी नहीं है यह सवाल सिर्फ आपके या मेरे मन का नहीं है यह सवाल हर उस भारतीय का है जिसे लगता है कि देशभक्ति सिर्फ सीमा पर बंधी नहीं रहनी चाहिए। हम यह नहीं कहते कि आर्ट को राजनीति में घसीटा जाए। हम यह नहीं कहते कि खेल को नफरत का अखाड़ा बनाया जाए।
हम सिर्फ इतना पूछते हैं जब देश दर्द में है, तो फिल्म और खेल जगत इतने बेदर्द क्यों? जब जवान लड़ रहे हैं, तब बाकी सब इतना सहज कैसे जी रहे हैं?
कड़वी सच्चाई यही है, भारत आज दो हिस्सों में बंटा है। एक वो जहाँ जवान पाकिस्तान से लड़ रहा है, और दूसरा वो जहाँ मनोरंजन जगत और क्रिकेट जगत पाकिस्तान के साथ खेल रहा है। पहला हिस्सा खून दे रहा है। दूसरा हिस्सा उन्हीं दुश्मनों को मंच दे रहा है।
तो क्या? यह मान लेना चाहिए— भारत की असली लड़ाई सिर्फ सेना, नेता और जनता लड़ रही है। बाकी इंडस्ट्री के लिए पाकिस्तान एक दुश्मन नहीं, बल्कि कमाई का मौका है।
क्या भारतीय सेना ही अकेले पाकिस्तान से लड़ाई लड़ती रहेगी? क्या बाकी देश सिर्फ दर्शक बनकर ताली बजाता रहेगा? क्या यही है हमारी संवेदनशीलता? क्या यही है हमारी एकता?
(लेखक यूथ इण्डिया न्यूज ग्रुप के डिप्टी एडिटर हैं)






