शरद कटियार
दीपावली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि संस्कारों, समृद्धि और आत्मबोध का उत्सव है। यह वह क्षण है जब हम अपने भीतर झाँकते हैं, अपने घर-आँगन में दीप जलाने के साथ मन के अंधेरों को भी मिटाने का संकल्प लेते हैं। दीपावली का अर्थ केवल दीप जलाना नहीं, बल्कि भीतर की मानवता, विश्वास और उम्मीद को प्रकाशित करना है।
आज जब समाज विभाजन, द्वेष और असमानता के अंधकार में उलझा हुआ है, तब दीपावली हमें याद दिलाती है कि प्रकाश की एक छोटी-सी लौ भी अंधकार को परास्त कर सकती है। राम की अयोध्या वापसी केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि यह संदेश है कि सत्य और धर्म की राह कठिन अवश्य हो सकती है, परंतु उसका अंत सदैव प्रकाशमय होता है।
इस वर्ष का दीपोत्सव हमें आत्ममंथन का अवसर देता है।
क्या हमारे आसपास के लोगों के घरों में भी रोशनी पहुँची है?
क्या हमारे समाज के गरीब, श्रमिक, किसान और जरूरतमंद चेहरे भी इस रोशनी में मुस्कुरा पा रहे हैं?
यदि नहीं, तो दीपावली अधूरी है — क्योंकि असली दीपावली तब है जब हर हृदय में समान अवसरों, न्याय और स्नेह का दीप प्रज्वलित हो।
आज विकास की रफ्तार, तकनीक की चमक और दिखावे की संस्कृति ने त्योहारों को भी बाज़ार का रूप दे दिया है। परंतु हमें याद रखना चाहिए कि दीपावली केवल खरीदारी नहीं, बल्कि संवेदना का पर्व है।
यह हमें सिखाती है कि दूसरों के जीवन में उजाला करना ही सच्चा धर्म है — चाहे वह एक दीया जलाना हो, किसी गरीब को भोजन देना हो, या किसी अकेले चेहरे पर मुस्कान लौटाना हो।
दीपावली हमें प्रेरित करती है कि हम केवल घर नहीं, दिल भी सजाएँ।
हम केवल दीप नहीं जलाएँ, बल्कि अपनी सोच को भी प्रकाशित करें।
और यही वह शक्ति है, जो भारत को विश्व में “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना से जोड़ती है।
आज का भारत केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना से भी चमक रहा है।
जब अयोध्या, काशी और मथुरा दीपों से जगमगाते हैं, तब यह सिर्फ़ धार्मिक आस्था का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीयता की एकता का प्रतीक बन जाता है।
इस दीपावली, आइए हम प्रण करें—
> “हम अपने भीतर का अंधकार मिटाएँगे, नफरत की जगह प्रेम का दीप जलाएँगे, और एक नए भारत के निर्माण में अपनी ज्योति जोड़ेंगे।”
आप सभी को शांति, समृद्धि और स्नेह से परिपूर्ण शुभ दीपावली महोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ।
दीपों की यह श्रृंखला आपके जीवन में नई ऊर्जा, विश्वास और अपार प्रकाश लेकर आए।






