जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में जारी सर्च ऑपरेशन केवल तीन आतंकियों की तलाश भर नहीं है, यह भारत की आंतरिक सुरक्षा, आतंक के खिलाफ दृढ़ इच्छाशक्ति और सैनिकों के बलिदान की कसौटी है। जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठन का नाम आते ही यह स्पष्ट हो जाता है कि यह लड़ाई सीमित नहीं, बल्कि विचारधारात्मक और दीर्घकालिक है।
किश्तवाड़ का पहाड़ी और घने जंगलों वाला भूगोल आतंकियों के लिए हमेशा से सुरक्षित पनाहगाह रहा है। यही वजह है कि सुरक्षा बलों को यहां केवल हथियारों से नहीं, बल्कि धैर्य, रणनीति और तकनीक के साथ आगे बढ़ना पड़ता है। ड्रोन, स्निफर डॉग और विशेष बलों की तैनाती इस बात का संकेत है कि अब आतंक के खिलाफ लड़ाई पारंपरिक नहीं, बल्कि आधुनिक और बहुस्तरीय हो चुकी है।
चतरू, सिंहपोरा और चिंगम क्षेत्रों में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को निलंबित करना नागरिक असुविधा जरूर पैदा करता है, लेकिन ऐसे संवेदनशील समय में यह फैसला सुरक्षा के हित में अपरिहार्य है। आतंकियों द्वारा संचार, अफवाहों और भ्रामक सूचनाओं का इस्तेमाल पहले भी देखा गया है। ऐसे में प्रशासन का यह कदम स्पष्ट संदेश देता है कि सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा।
18 जनवरी को ऑपरेशन के दौरान एक पैराट्रूपर की शहादत और सात सैनिकों का घायल होना इस सच्चाई को उजागर करता है कि आतंक के खिलाफ यह लड़ाई कितनी महंगी पड़ती है। हर शहीद केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक परिवार, एक सपना और एक अधूरी कहानी होता है। राष्ट्र का दायित्व केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह बलिदान व्यर्थ न जाए।
किसी भी आतंकवाद विरोधी अभियान में स्थानीय जनता की भूमिका सबसे अहम होती है। प्रशासन की यह अपील कि नागरिक अफवाहों से दूर रहें और संदिग्ध गतिविधियों की सूचना दें, केवल औपचारिकता नहीं है। आतंकवाद तभी कमजोर पड़ता है, जब उसे सामाजिक समर्थन नहीं मिलता।
अंतिम चरण या लंबी लड़ाई निर्णायक मोड़ पर है, लेकिन अनुभव बताता है कि आतंकवाद के खिलाफ कोई भी जीत अंतिम नहीं होती। एक ऑपरेशन समाप्त होता है, दूसरा शुरू हो जाता है। असली जीत तभी मानी जाएगी, जब घुसपैठ, स्थानीय नेटवर्क और वैचारिक कट्टरता—तीनों पर एक साथ प्रहार हो।
किश्तवाड़ का यह अभियान हमें याद दिलाता है कि शांति कोई स्थायी स्थिति नहीं, बल्कि लगातार चौकसी का परिणाम है। सैनिक मोर्चे पर हैं, प्रशासन निर्णय ले रहा है और अब जिम्मेदारी समाज की है कि वह आतंक और अफवाह, दोनों को खारिज करे। यह सिर्फ़ किश्तवाड़ की लड़ाई नहीं है।यह उस भारत की लड़ाई है, जो डर के आगे झुकता नहीं, बल्कि बलिदान की कीमत समझता है।





