अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व को लेकर एक बार फिर ईरान नीति चर्चा में है। रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि यदि चल रही कूटनीतिक वार्ताएं असफल रहती हैं, तो अमेरिका जल्द ही ईरान के खिलाफ बड़ा सैन्य अभियान शुरू कर सकता है। इस संभावित कार्रवाई में उसका करीबी सहयोगी इजरायल भी साथ दे सकता है।
अमेरिकी मीडिया पोर्टल Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों देशों ने संयुक्त सैन्य विकल्पों पर पहले से व्यापक तैयारी कर रखी है। सूत्रों का कहना है कि यदि ईरान के साथ चल रही वार्ता अपेक्षित परिणाम नहीं देती, तो यह अभियान सीमित नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर हो सकता है। अनुमान है कि यह कार्रवाई पिछले 12 दिनों तक चले सैन्य अभियान से अधिक तीव्र और प्रभावशाली होगी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि संभावित हमले का केंद्र ईरान की राजधानी तेहरान हो सकता है। हालांकि आधिकारिक स्तर पर किसी हमले की पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन सैन्य हलकों में गतिविधियां तेज होने से कयास बढ़ गए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की कार्रवाई का व्यापक क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव पड़ सकता है।
इस समय दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत जारी है, जिसमें यूरोपीय मध्यस्थ भी शामिल हैं। वार्ता का प्रमुख केंद्र परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दे हैं। स्विट्जरलैंड के शहर जिनेवा में हो रही चर्चाओं के बीच दोनों पक्षों की ओर से सख्त बयानबाजी भी जारी है।
सूत्रों के अनुसार, अमेरिका ने मध्य-पूर्व क्षेत्र में अपने सैन्य ठिकानों पर तैनाती बढ़ा दी है। लड़ाकू विमानों, मिसाइल रक्षा प्रणालियों और नौसैनिक बेड़ों की गतिविधियों में वृद्धि देखी गई है। यह कदम संभावित सैन्य विकल्प को मजबूत करने के रूप में देखा जा रहा है। पूरे मध्य-पूर्व क्षेत्र में सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं।
डोनाल्ड ट्रंप ने हालिया बयान में कहा है कि यदि वार्ता असफल रहती है तो सैन्य विकल्प खुला है। उनका कहना है कि अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों और सहयोगियों की सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। दूसरी ओर ईरानी नेतृत्व ने भी कड़ा रुख अपनाया है और किसी भी हमले की स्थिति में कड़ी प्रतिक्रिया की चेतावनी दी है।
ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामनेई ने हाल ही में कहा कि उनका देश दबाव में नहीं झुकेगा। उन्होंने अमेरिका को चेतावनी दी कि किसी भी आक्रामक कदम का जवाब दिया जाएगा। इस बयान के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सैन्य टकराव हुआ तो इसका असर वैश्विक तेल बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों और भू-राजनीतिक समीकरणों पर पड़ेगा। फारस की खाड़ी और आसपास के समुद्री मार्ग विशेष रूप से संवेदनशील माने जा रहे हैं।
फिलहाल दुनिया की नजर जिनेवा में जारी वार्ता और वाशिंगटन तथा तेहरान की राजनीतिक गतिविधियों पर टिकी है। कूटनीति सफल होती है या क्षेत्र एक नए सैन्य संघर्ष की ओर बढ़ता है—यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।


