– जस्टिस जे.मुनीर की बेंच ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई की पूरी
– फर्रुखाबाद के वकील अवधेश मिश्रा के कथित षड्यंत्र का खुलासा
प्रयागराज /फर्रुखाबाद। जनपद फर्रुखाबाद के चर्चित बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के मामले में कथित षड्यंत्र और भ्रामक तथ्यों के जरिए न्यायालय को गुमराह करने की कोशिश आखिरकार उजागर हो गई। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पूरे प्रकरण की सुनवाई पूरी करते हुए स्पष्ट किया कि याचिका में अब कोई आदेश पारित करने की आवश्यकता नहीं है, जिससे फतेहगढ़ पुलिस अधीक्षक को राहत मिली है।
मामले की शुरुआत कायमगंज निवासी प्रीति यादव पत्नी अर्जुन सिंह यादव द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों से हुई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि 8 सितंबर की रात कायमगंज कोतवाली प्रभारी निरीक्षक अनुराग मिश्रा व अन्य पुलिसकर्मियों ने उनके पति को अवैध रूप से हिरासत में लेकर बंधक बनाया और छोड़ने के नाम पर रिश्वत मांगी। इस संबंध में उन्होंने उच्च अधिकारियों को प्रार्थना पत्र भेजने के साथ-साथ उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की थी।
हालांकि, सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने स्वयं न्यायालय को बताया कि उन्हें न तो अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था और न ही उनके साथ वैसा व्यवहार हुआ जैसा आरोप लगाया गया था। इस बयान के बाद न्यायालय ने मामले को गंभीरता से लेते हुए अधिवक्ता अनमोल यादव और राजेंद्र प्रसाद दुबे को नोटिस भी जारी किया था ।
प्रकरण में अक्टूबर 2025 को उस समय नाटकीय मोड़ आया, जब हाईकोर्ट के अधिवक्ता संतोष पांडे ने हलफनामा दाखिल कर आरोप लगाया कि उनके रिश्तेदार फर्रुखाबाद निवासी अधिवक्ता अवधेश मिश्रा के घर 11 अक्टूबर की रात पुलिस ने छापा मारा, जो कथित रूप से इस याचिका से जुड़ा था। इस पर न्यायालय ने तत्काल संज्ञान लेते हुए फतेहगढ़ की पुलिस अधीक्षक आरती सिंह को अगले दिन व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर जवाब देने के निर्देश दिए।
पुलिस अधीक्षक न्यायालय में उपस्थित हुईं और उन्होंने स्पष्ट किया कि अवधेश मिश्रा के घर छापा याचिका के कारण नहीं, बल्कि उनके खिलाफ दर्ज मुकदमा अपराध संख्या 271/2025 के तहत एसआईटी जांच के आधार पर की गई कार्रवाई के कारण डाला गया था। पुलिस ने न्यायालय को वास्तविक स्थिति से अवगत कराया।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जे . मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका संख्या 854/2025 पर 2 अप्रैल 2026 को निर्णय सुनाते हुए कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता को हिरासत में लेने के बाद छोड़ दिया गया, इसलिए अब इस याचिका में किसी आदेश की आवश्यकता नहीं
है। साथ ही न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिवक्ताओं संतोष पांडे और अवधेश मिश्रा द्वारा प्रस्तुत तथ्यों की जांच इस याचिका के दायरे में नहीं आती।
बताना जरुरी है कि अवधेश मिश्रा संबंधित याचिकाकर्ता प्रीति यादव के अधिवक्ता रहे ही नहीं थे। याचिकाकर्ता प्रीति यादव और उनके फर्रुखाबाद के अधिवक्ता रोहित यादव ने इस संबंध में शपथ पत्र देकर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की।
पूरे घटनाक्रम में यह भी आरोप सामने आया कि हाईकोर्ट के अधिवक्ता संतोष पांडे ने अपने रिश्तेदार अवधेश मिश्रा को बचाने के उद्देश्य से बिना अधिकृत जानकारी के याचिका में हस्तक्षेप किया और भ्रामक तथ्यों के आधार पर न्यायालय व मीडिया को भी गुमराह किया, कि एसपी फतेहगढ़ को उच्च न्यायालय ने हाउस अरेस्ट किया और अधिवक्ता समाज का उत्पीड़न किया जबकि ऐसा नहीं हुआ । गौरतलव हो कि अवधेश मिश्रा का संबंध कथित रूप से माफिया अनुपम दुबे, संजीव परिया, गैंगेस्टर अनुराग दुबे डब्बन, अमित दुबे बब्बन, योगेंद्र सिंह यादव चंन्नू, और देवेंद्र सिंह यादव जग्गू सहित कई आपराधिक गिरोहों से रहा है और उनके खिलाफ पूर्व में भी मुकदमे दर्ज रहे हैं।अपनी गिरफ़्तारी से बचने के लिए और
पुलिस को बदनाम करने के लिए पूरा हाईटेक ड्रामा किया गया, जिसमें यह तक प्रचारित किया गया कि पुलिस अधीक्षक को न्यायालय में “हाउस अरेस्ट” कर लिया गया, जबकि वास्तविकता यह थी कि न्यायालय ने केवल जवाब-तलब के लिए उन्हें तलब किया था।
न्यायालय के फैसले के बाद स्पष्ट हो गया कि पूरे प्रकरण में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया था। वहीं, फतेहगढ़ पुलिस की कार्रवाई को न्यायालय के समक्ष सही ठहराव मिला, जिससे पुलिस प्रशासन को बड़ी राहत मिली है।
एसपी फतेहगढ़ आरती सिंह व पुलिस को हाईकोर्ट से राहत


