
प्रशांत कटियार
सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की दुनिया को लोकतांत्रिक बना दिया है। अब आम आदमी भी अपनी बात बिना किसी संपादक, मंच या सत्ता की अनुमति के लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है। यह एक बड़ा बदलाव है, जिसने कई दबे हुए मुद्दों को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन इसी ताकत का दुरुपयोग आज समाज के लिए एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।
आज हालात यह हैं कि अफवाहें, फर्जी खबरें और भड़काऊ सामग्री कुछ ही सेकंड में वायरल हो जाती हैं। बिना पुष्टि के साझा की गई जानकारी सच से ज़्यादा तेज़ फैलती है। कई बार बाद में सफाई दी जाती है, लेकिन तब तक नुकसान हो चुका होता है। सोशल मीडिया अब केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि भावनाओं को भड़काने का औज़ार भी बनता जा रहा है।
राजनीतिक ध्रुवीकरण में सोशल मीडिया की भूमिका सबसे ज़्यादा चर्चा में है। विचारधाराओं के नाम पर नफरत, ट्रोलिंग और गाली-गलौज सामान्य होती जा रही है। असहमति को दुश्मनी समझा जाने लगा है। धार्मिक और जातीय मुद्दों पर भ्रामक पोस्ट समाज में तनाव पैदा कर रही हैं। कई बार यह तनाव सड़कों तक पहुँच जाता है और हिंसा का रूप ले लेता है। ऐसे मामलों में बाद में पता चलता है कि विवाद की जड़ एक झूठी या तोड़-मरोड़कर पेश की गई पोस्ट थी।
युवा वर्ग पर सोशल मीडिया का प्रभाव सबसे गहरा है। लाइक्स, फॉलोअर्स और रील्स की दौड़ ने आत्म-मूल्य को आभासी मानकों से जोड़ दिया है। तुलना की इस संस्कृति में कई युवा खुद को कमतर महसूस करने लगते हैं। मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। घंटों स्क्रीन पर बिताया गया समय वास्तविक जीवन के रिश्तों को कमजोर कर रहा है। संवाद की जगह दिखावा और प्रतिस्पर्धा ने ले ली है।
सोशल मीडिया ने जहां लोगों को जोड़ने का दावा किया था, वहीं आज वह कई बार समाज को बाँटने का कारण बन रहा है। परिवार, दोस्त और सहकर्मी भी वैचारिक मतभेदों के कारण एक-दूसरे से दूर हो रहे हैं। संवाद की जगह आरोप और प्रतिक्रिया ने ले ली है। यह स्थिति लोकतंत्र और सामाजिक सौहार्द दोनों के लिए चिंताजनक है।
इसका समाधान सोशल मीडिया को बंद करना नहीं है, बल्कि उसे समझदारी से इस्तेमाल करना है। डिजिटल साक्षरता आज उतनी ही ज़रूरी है जितनी सामान्य शिक्षा। लोगों को यह सिखाने की आवश्यकता है कि क्या साझा करना है, क्या नहीं; किस पर भरोसा करना है और किस पर नहीं। अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ जिम्मेदारी भी अनिवार्य है।
सरकार, प्लेटफॉर्म कंपनियों और समाज—तीनों की साझा भूमिका बनती है। नियमों का सख्ती से पालन, फर्जी खबरों पर त्वरित कार्रवाई और उपयोगकर्ताओं में जागरूकता ही इस समस्या का समाधान है। अगर सोशल मीडिया को सही दिशा नहीं दी गई, तो यह संवाद और बदलाव का माध्यम कम और टकराव व विभाजन का हथियार अधिक बनता जाएगा।
आज सवाल केवल तकनीक का नहीं, बल्कि सोच का है। सोशल मीडिया हमारे हाथ में है—यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसे समाज को जोड़ने का माध्यम बनाएं या उसे तोड़ने का।






