– संत समाज ने 6 नंबर सीढ़ी पर अलग से किया मेले का उद्घाटन
– प्रशासन ने रुद्राभिषेक के जरिए अपना किया उद्घाटन
– सदर विधानसभा में होने वाले इस पौराणिक आयोजन में सदर विधायक भी बना गए दूरी,
– सांसद मुकेश राजपूत और अन्य विधायक भी इस बार रहे नदारत
फर्रुखाबाद: पांचाल घाट गंगा तट (Panchal Ghat on the banks of the Ganges) पर आयोजित मेला श्री रामनगरिया मेला 2026 (Shri Ramnagariya Mela) इस बार धार्मिक आस्था से अधिक संत समाज और प्रशासन के बीच उभरे आतंरिक विभाजन को लेकर चर्चा में है। वर्षों में पहली बार ऐसा दृश्य सामने आया, जब संतों के इस ऐतिहासिक मेले में ही उद्घाटन से लेकर धार्मिक अनुष्ठानों तक दो अलग-अलग धाराएं साफ दिखाई दीं।
मेले का एक उद्घाटन संत समाज द्वारा गंगा तट की 6 नंबर सीढ़ी पर हुआ, जहां संत सत्यगिरी महाराज, बच्चा बाबा (रानी खेड़ा धाम) सहित करीब डेढ़ सौ संतों ने सामूहिक रूप से अलग उद्घाटन कर दिया। इस आयोजन में संत समाज की उपस्थिति और एकजुटता तो दिखी, लेकिन प्रशासन पूरी तरह अनुपस्थित रहा। संतों ने परंपरागत तरीके से मेले का शुभारंभ कर यह संकेत दिया कि वे इस बार अपने निर्णय और आयोजन को लेकर स्वतंत्र रुख अपनाए हुए हैं।
दूसरी ओर प्रशासन नें दुर्वासा आश्रम के संत ईश्वर दास के साथ अलग मंच से उद्घाटन किया गया। इस कार्यक्रम में जिलाधिकारी, अपर जिलाधिकारी और मुख्य विकास अधिकारी और अन्य प्रशासनिक अमला मौजूद रहा।
हालांकि यह उद्घाटन राजनीतिक रूप से भी प्रभावहीन नजर आया, क्योंकि सदर विधानसभा मे आयोजित हो रहे इस पौराणिक मेले मे हमेशा की तरह सदर विधायक मेजर सुनील दत्त द्विवेदी ही नहीं मौजूद रहे,वहीं विधायक, अमृतपुर विधायक सुशील शाक्य, कायमगंज विधायक डॉक्टर सुरभि और सांसद मुकेश राजपूत जैसे प्रमुख जनप्रतिनिधि कार्यक्रम में नहीं पहुंचे, जनप्रतिनिधियों में सिर्फ भोजपुर विधायक नागेंद्र सिंह राठौर शामिल हुए। इससे प्रशासनिक उद्घाटन की चमक और प्रभाव दोनों ही सीमित रह गए।
मेले के दौरान आयोजित रुद्राभिषेक कार्यक्रम में भी यही स्थिति देखने को मिली। इस महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान में केवल चंद प्रशासनिक अधिकारी ही मौजूद रहे, जबकि अधिकांश संत समाज ने इससे दूरी बनाए रखी। यह पहली बार था जब रामनगरिया मेले के रुद्राभिषेक में संतों की सामूहिक भागीदारी लगभग न के बराबर दिखाई दी। संत समाज की यह दूरी साफ तौर पर यह दर्शा रही थी कि मेले को लेकर अंदरूनी असंतोष और मतभेद गहरे हैं।
इस बार मेला व्यवस्थाओं के लिहाज से पहले से अधिक तकनीकी और आधुनिक जरूर नजर आया। निगरानी, सुविधाएं और प्रशासनिक नियंत्रण बेहतर दिखे, लेकिन जिस संतों के वैभव, गरिमा और आध्यात्मिक आभा के लिए रामनगरिया मेला जाना जाता है, वह इस बार फीकी पड़ गई। दिलचस्प बात यह रही कि संत समाज पहली बार मेले में संतुष्ट तो दिखा, लेकिन वह संतोष सामूहिकता में नहीं, बल्कि अलगाव में नजर आया।
कुल मिलाकर श्री रामनगरिया मेला 2025 एक ऐसे मोड़ के रूप में सामने आया, जहां तकनीक और व्यवस्थाएं आगे रहीं, लेकिन परंपरा की आत्मा मानी जाने वाली संत समाज की एकता कमजोर दिखाई दी। उद्घाटन से लेकर अनुष्ठानों तक दिखा यह दो फाड़ भविष्य के लिए कई सवाल छोड़ गया है—क्या आने वाले वर्षों में यह मेला फिर से संतों की सामूहिक पहचान और वैभव को हासिल कर पाएगा, या यह विभाजन इसकी परंपरा पर स्थायी छाया डाल देगा।


