– वर्षों बाद खानापूर्ति की भेंट चढ़ा मिनी कुंभ, कई लाख हुए स्वाहा।
फर्रुखाबाद: आस्था, परंपरा और सामाजिक समरसता का प्रतीक माना जाने वाला प्राचीन मेला श्री रामनगरिया मेला (Shri Ramnagariya fair) इस बार जातिवाद, अव्यवस्था और कथित भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। वर्षों बाद ‘मिनी कुंभ’ के रूप में प्रचारित इस आयोजन में न तो व्यवस्थाएं जमीन पर हैं,और न ही लाखों रुपये के खर्च का कोई ठोस असर। नतीजा—श्रद्धालु परेशान, आस्था आहत और प्रशासन सवालों के घेरे में।
राज्य सरकार द्वारा आस्था, स्वच्छता और सुव्यवस्थित आयोजन के लिए तय की गई योगी आदित्यनाथ की मंशा को स्थानीय स्तर पर पलीता लगता दिखा। जिस उद्देश्य से मेले को ‘मिनी कुंभ’ का स्वरूप दिया गया था, वही उद्देश्य अव्यवस्था, पक्षपात और लापरवाही की भेंट चढ़ गया। कथित शासन की स्पष्ट गाइडलाइंस के बावजूद न स्वच्छता मानक पूरे हुए और न ही भीड़ प्रबंधन।
जातीय खेमेबंदी ने निगल ली आस्था
स्थानीय लोगों का आरोप है कि मेला आयोजन में सामाजिक संतुलन के बजाय जातीय समीकरण हावी है। इससे न केवल सहभागिता प्रभावित हो रही, बल्कि निर्णय प्रक्रिया भी पक्षपातपूर्ण रही। कई संत-महात्मा और परंपरागत सेवाभावी संस्थाएं उपेक्षा का शिकार हैं, जिससे मेले की मूल आत्मा को ठेस पहुंची।
प्रचार-प्रसार में ‘मिनी कुंभ’ का शोर रहा, लेकिन मौके पर पेयजल, शौचालय, सफाई, प्रकाश, चिकित्सा और यातायात जैसी बुनियादी सुविधाएं नाकाफी हैं। घाटों पर भीड़ प्रबंधन कमजोर है, जिससे श्रद्धालुओं को घंटों जूझना पड़ा। भारी के बजट के बावजूद व्यवस्थाओं का स्तर सवाल खड़े करता है।
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि बजट का बड़ा हिस्सा कागजी कामों और दिखावटी मदों में खप रहा। ठेके, टेंडर और भुगतान की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। मांग की जा रही है कि पूरे खर्च का सार्वजनिक ऑडिट कराया जाए।
श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए बनी दुर्वासा आश्रम जाने वाली नव निर्मित सड़क पूरी तरह मानक विहीन है कार्यदाई संस्था की मनमानी और घोर कमीशनखोरी के चलते न केवल सड़क गुणवत्ता विहीन है बल्कि हटाए गए अतिक्रमण में भी जाति देखकर तोड़फोड़ की गई।आरोप है कि यह सड़क भी भारी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी, जबकि उद्घाटन के वक्त बड़े-बड़े दावे किए गए थे।
अधिकारियों के दावे और जमीनी हकीकत में साफ अंतर दिखा।
मेला श्री रामनगरिया जैसी ऐतिहासिक आस्था को जातीय राजनीति और कथित भ्रष्टाचार से मुक्त करना समय की मांग है। वरना हर साल ‘मिनी कुंभ’ का नाम लेकर करोड़ों स्वाहा होते रहेंगे और श्रद्धालु आस्था के साथ लौटते रहेंगे—बिना सुविधा, बिना भरोसे।


