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Thursday, April 9, 2026

अमेरिका-ईरान युद्धविराम पर तीखी चेतावनी: पूर्व सुरक्षा सलाहकार बोले—राजनीतिक मजबूरी का फैसला, आगे बढ़ सकता है टकराव

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न्यूयार्क। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने ईरान के साथ हुए युद्धविराम को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने इसे एक रणनीतिक निर्णय के बजाय राजनीतिक मजबूरी का परिणाम बताया है।

बोल्टन के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लिया गया यह फैसला मुख्य रूप से घरेलू दबावों से प्रभावित था। उन्होंने कहा कि अमेरिका में बढ़ती ईंधन कीमतें और गिरती लोकप्रियता इस निर्णय के पीछे अहम कारण हो सकते हैं।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यह युद्धविराम लंबे समय तक कायम नहीं रहता, तो ईरान, इस्राइल और अमेरिका के बीच टकराव और गहरा सकता है, जिससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने का खतरा है।

बोल्टन ने कहा कि ट्रंप की नीतियों में अक्सर राष्ट्रीय हितों से अधिक व्यक्तिगत और राजनीतिक हितों को प्राथमिकता दी जाती है। यदि यही प्रवृत्ति जारी रही, तो इसका दीर्घकालिक नुकसान अमेरिका को उठाना पड़ सकता है।

रणनीतिक दृष्टि से उन्होंने Hormuz Strait (हॉर्मुज जलडमरूमध्य) का विशेष उल्लेख किया। उनके मुताबिक, इस क्षेत्र पर किसी एक देश का नियंत्रण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।

बोल्टन ने कहा कि पिछले कई दशकों से अमेरिका की नीति रही है कि खाड़ी क्षेत्र के तेल मार्गों पर किसी एक देश का प्रभुत्व न हो। यदि ईरान इस क्षेत्र में मजबूत स्थिति बना लेता है, तो यह अमेरिका के लिए रणनीतिक झटका होगा।

इस युद्धविराम के पीछे कई देशों की भूमिका भी सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, Pakistan (पाकिस्तान), Turkey (तुर्की) और Egypt (मिस्र) ने पर्दे के पीछे कूटनीतिक प्रयास किए।

बोल्टन ने यह भी कहा कि ट्रंप और पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर के बीच अच्छे संबंध हैं, जिसका असर इस पूरे घटनाक्रम पर पड़ा हो सकता है।

उन्होंने संकेत दिया कि China (चीन) ने भी ईरान पर दबाव बनाया हो सकता है, ताकि तेल आपूर्ति प्रभावित न हो और वैश्विक बाजार स्थिर बना रहे।

ईरान की मौजूदा स्थिति पर बोल्टन ने कहा कि हालिया हमलों से वहां की सैन्य संरचना को नुकसान जरूर पहुंचा है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं है। सरकार अब भी कायम है और उसकी रणनीतिक क्षमता बनी हुई है।

उन्होंने यह भी आशंका जताई कि यदि ईरान पर से प्रतिबंध हटते हैं, तो वह तेल से मिलने वाली आय का इस्तेमाल अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को मजबूत करने में कर सकता है, जो वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है।

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